तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११९ मुक्तशिवों को अनादिशिव के सम्मुख सृजन तथा विलयन ( संहार ) आदि कृत्यों में जैसे अधिकार वर्जित है। मन्दतीव्र शक्तिपात से सद्गुरु की ओर गमन की अभिलाषा होती है और असद्गुरु के विषयमें उसकी गति का अभाव हो जाता है।¹ असद्गुरु के से सद्गुरु के पास जाना शक्तिपात से ही उत्पन्न होता है। सद्गुरु तो स्वयं इन सभी शास्त्रों से उदित तत्त्वज्ञान के द्वारा पूर्ण हैं और वे साक्षात् भगवान् भैरवभट्टारक हैं।² योगिगण भी अपने में अभ्यस्त ज्ञान के द्वारा ही मुक्त करनेवाले होते हैं—उनकी योग्यता शिवतादात्म्यरूप है³, सौभाग्य और लावण्य आदि गुण वहाँ अनुपयोगी हैं। असद्गुरु में अन्य सभी गुण ( शिवतादात्म्य को छोड़कर ) होते हैं। इस प्रकार सद्गुरु प्रति गमनशील⁴ जीव ज्ञानात्मक दीक्षा गुरु से १. मन्द-तीव्र शक्तिपात के प्रभाव से सद्गुरु लाभ की इच्छा होती है और इसके फलस्वरूप असद्गुरु के पास जाने की इच्छा चली जाती है। २. परमेश्वर से साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर जिन्होंने उनके साथ तदात्मता कर ली है वही सद्गुरु है, केवल तत्त्व के उपदेश करनेवाले जो आचार्य हैं वे असद्गुरु हैं। ३. तीव्र तीव्र शक्तिपात होने पर शिष्य में जो बहिर्मुखभाव पहले वर्तमान था वह कट जाता है और स्वतः ही उसके हृदय में अपने स्वरूप सम्बन्धी प्रत्यवमर्शन होने लगता है। इस स्वरूपप्रत्यवमर्शन ही उसे शिवतादात्म्य रूप बोध में उन्नीत करता है। जिस शिवसम्बन्धी शक्ति ने एक समय उसे संसार रूप भूमि में लाकर स्वरूप में आवरण डाली थी वही वामाशक्ति संसार को अपने अन्तर्लीन कर ज्येष्ठाशक्ति के रूप में प्रकट होती है और जिसके सहारे परिपूर्ण स्वरूप खोल जाता है। वामाशक्ति क्षोभमयी है, शान्ता प्रशममयी है। शान्ताशक्ति के साथ जब उसकी एकाकारता सम्पन्न होता है तब उसका स्वरूप वास्तव में शुद्धविद्यामय ही है। धीरे-धीरे उसमें शक्तिस्थिति में सुदृढ़निष्ठा उत्पन्न होता है और तब सब प्रकार आवरण के हठ जाने पर उसमें पूर्ण कर्त्तृत्व आदि गुणों की अभिव्यक्ति होती है। ४. सद्गुरु की ओर जाने की इच्छा जिस भाग्यशाली जीव में उदित होता है उसका प्राथमिक लक्षण कुछ हैं। वे निम्नप्रकार हैं—संसार में वास्तविक तत्त्व क्या है और कौन यथार्थतत्त्वज्ञानी है। इस प्रकार विचार भी शक्ति- पातवश ही हृदय में उठता है। कल्याणमित्र से परिचय के द्वारा वह