तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११ प्राप्त करते हैं, उस दीक्षा के द्वारा शिष्य तत्काल मुक्त हो जाता है और जीवन्मुक्ति भी प्राप्त करता है। गुरु की दृष्टि के द्वारा, उनके कथित तत्त्वों से, शास्त्र सम्बोधन से, बाहरी अनुष्ठान के दर्शन से, चरु के दान से आदि दीक्षा के नाना प्रकार भेद हैं । अभ्यासशील ( जो बारम्बार प्राण चारों का आमर्शन करते रहते हैं, ) व्यक्ति तत्काल प्राणवियोजिका दीक्षा प्राप्त करता है ।१ ऐसी दीक्षा मृत्यु के समय देनी चाहिए—इस विषय में आगे बतलायेंगे । इस प्रकार तीव्र शक्तिपात तीन प्रकार हैं। जो शिष्य उत्कृष्टमध्य शक्तिपात के अनन्तर दीक्षा प्राप्त कर लेता है लेकिन उसमें अपने शिवभाव के विषय में सुदृढ़ निष्ठा उत्पन्न नहीं होती, निष्ठा के क्रमिक परिपाक हो जाने पर शरीर छूट जाता है और उसमें शिवभाव आ जाता है । मध्यममध्य शक्तिपात होने पर शिवभावप्राप्ति के प्रति उत्सुकता आ जाने पर भी शिष्य भोगाकांक्षी होता है उस अवस्था में दीक्षा मिलने पर ज्ञान की प्राप्ति होती है। योग के अभ्यास के द्वारा प्राप्तव्य भोगों को इस देह से भोग करने के बाद देहान्त होने पर शिव ही हो जाता है । निकृष्ट-मध्य शक्तिपात से नवीन शरीर से भोग प्राप्त कर अन्त में शिवत्व लाभ करता है । मध्यम प्रकार शक्तिपात तीन प्रकार हैं। जब भोग के प्रति उत्सुकता अधिक है तब वह मन्द शक्तिपात है। उसमें परमेश्वर सम्बन्धी मंत्रयोग रूप उपाय से ही उस शिष्य में उत्सुकता आती है। परमेश्वरसम्बन्धी मंत्रयोग मोक्ष पर्यन्त गति को प्राप्त कराता है। इसलिए इसके पूर्वभावी जीव सद्गुरु के समीप उपस्थित होता है। सद्गुरु के द्वारा उसे दीक्षा प्राप्त होती है । दीक्षा भी नानाप्रकार है जिसका विवरण दृष्टि आदि शब्दों से वर्णित किया गया है । १. ऐसी भी दीक्षा है जिसके मिलने से तत्काल शरीर छूट जाता है। जिसका प्रारब्धभोग शेष रह गये हैं उसे प्राणवियोजिका दीक्षा नहीं दी जाती हैं। प्राण के चारों को बारम्बार आमर्शनरूप अभ्यास के द्वारा प्राणवियोजिका दीक्षा दी जाती है । जिनका मृत्युकाल निकट है, जो जरा से जर्जर है, नानाप्रकार व्याधि ने जिसमें घर कर लिया है सद्गुरु ऐसे शिष्य को परमतत्त्व में योजित कर देते हैं। मृत्यु का क्षण न जानकर इस प्रकार दीक्षा नहीं दी जाती है ।