तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 294 में से
संदर्भ में पढ़ेंआ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२१ शक्तिपात अवश्य स्वीकार्य है। इस प्रकार ( तीव्रमन्द, मध्यमन्द और मन्दमन्द ) शक्तिपातों में तरतमभाव है इसलिए ये मुख्य शक्तिपात तीन प्रकार हैं। वैष्णवों का अनुग्रह राजा से प्राप्त अनुग्रह के समान है जिसका अन्तिम लक्ष्य मोक्ष नहीं है, इसलिए यहाँ उसका विवेचन नहीं हुआ। सभी प्रकार शक्तिपातों में शिवशक्ति का अधिष्ठान विद्यमान है ऐसा कहा गया है। यह उत्कृष्ट ज्येष्ठाशक्ति नहीं है, अपितु घोरा या घोरतरा है। यह शक्तिपात नानाप्रकार होने पर भी तरतमभाव रहने के कारण बहु- प्रकार बन जाता है। जो वैष्णव आदि सम्प्रदाय में स्थित है वह समयी आदि क्रम से स्रोतःपंचकमय शास्त्रों से ज्ञान प्राप्त कर उसमें परिपाक आ जाने पर भगवान् से प्रकट सर्वोत्तीर्ण त्रिकशास्त्र में श्रेष्ठ अधिकार प्राप्त करता है। इससे भिन्न जो है वह अनन्त प्रकार उपायों के सहारे एक-एक क्रम के अतिक्रमणके द्वारा परमार्थ को प्राप्त करता है। फिर कोई बिना किसी क्रम से उसे प्राप्त करता है।¹ जो आचार्यगण निम्नकोटि के शास्त्र के अनुशासन के अन्तर्गत हैं वे इस शास्त्र के द्वारा कथित मण्डल के दर्शन करने का भी अधिकार नहीं रखता है।² लेकिन ऊर्ध्वशासन में जो गुरु स्थित हैं वे निम्न निम्नकोटि के अनुशासन ( शास्त्रों ) की प्रेरणा देते हैं, क्यों कि वे पूर्ण हैं इसलिए सब विषयों में उनका अधिकार वर्तमान है।³ १. सबसे ऊर्ध्व या उत्कृष्ट स्थिति प्राप्त करना आसान नहीं है, अधिकार के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थितियों को पार करते हुए अन्त में परमार्थ को प्राप्ति होती है। क्रम शब्द से स्थितियों के क्रम को ही समझना चाहिए। भिन्न- भिन्न भुवनों में भोग प्राप्त करने के बाद कृपा के अवतरण होने पर शुद्ध स्थिति का लाभ होता है। २. आगम या तन्त्र के अनुसार दीक्षा प्राप्त होने पर जिन अधिकारों की प्राप्ति होती है उनकी प्राप्ति निम्नकोटि के आचार्यों को भी नहीं होती। यन्त्र, मण्डल आदि की रचना तो दूर की बात है निम्नकोटी में स्थित आचार्य गण उनके दर्शन से भी वर्जित है। ३. त्रिकशास्त्र के अनुसार जो आचार्यपदवी में आरूढ़ हैं वे पूर्णता प्राप्त हैं, इसलिए निम्नकोटि के शास्त्रों के वे जैसे प्रेरक बनते हैं वैसे ऊर्ध्वकोटि के शास्त्रों में भी वे अधिकार रखते हैं।