तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११ वह देशिक, गुरु, आचार्य, दीक्षाकर्त्ता, चुम्बक है । वह पूर्णज्ञानी हो तो सर्वोत्तम है—ऐसे न होने पर दीक्षा आदि होना सम्भव नहीं होता । लेकिन योगी गुरु यदि फलाकाङ्क्षी शिष्य के साथ युक्त रहता है तो उपाय के उपदेश के द्वारा व्यवधान रहित फल दे सकता है, उपाय के उपदेश से ज्ञान में ही युक्त रहकर मोक्ष भी प्राप्त करता है । ज्ञान की पूर्णता के अभिलाषी नाना गुरुओं का आश्रयण कर सकता है ।¹ उत्तम से उत्तम और विभिन्न प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति के लिये भिन्न-भिन्न गुरुओं के पास रहना चाहिए । जो गुरु पूर्णज्ञानवान् हैं उनके त्यागने से प्रायश्चित्त आवश्यक है । अगर वे न बतलाते हैं या विपरीत बातें बतलाते हैं तो भी क्या वे त्यागने योग्य नहीं हैं ? हम कहते हैं—नहीं, क्यों कि वे पूर्ण ज्ञानवान है इसलिए उनमें राग आदि नहीं है । उनका न कहना ( अकथन ) शिष्य में किसी प्रकार अयोग्यता या श्रद्धा आदि के अभाव- रूप कारण से ऐसा होता है । इसलिए उनकी उपासना में शिष्य को प्रयत्नशील रहना चाहिए । उनके त्यागने से नहीं । इस प्रकार अनुग्रह ही शक्तिपात का कारण है जो निरपेक्ष ही है । तिरोभाव कर्म आदि नियति की अपेक्षा रखता है । अब तिरोभाव का वर्णन हो रहा है । तिरोभाव वास्तव में कर्म आदि की अपेक्षा रखता है जिसके फलस्वरूप जीव गम्भीर दुःख और मोह आदि परिणाम प्राप्त करता है । जैसे कि परमेश्वर प्रकाशरूप हैं। वह अपने स्वतन्त्रता के खेल से प्रबुद्ध होकर भी मोहित जनों के सदृश ( मूर्ख की तरह ) आचरण करता है और हृदय से मूर्ख के आचरण की निन्दा करता है, फिर मूर्ख होते हुए भी प्रबुद्धजन के आचरण जैसे मंत्राराधन आदि करता है, निन्दा भी करता है । उसकी मूढ़चेष्टा यद्यपि चलती रहती है तो भी उस प्रबुद्ध की मूढ़चेष्टा ताकि नाश हो जाय इस प्रकार प्रबुद्ध का आचरण चलता है । उस प्रबुद्धचेष्टा ( प्रबुद्ध का आचरण ) जब निन्दा के साथ की जाती है तब वह निषिद्ध आचरण का रूप धारण करती है, वह स्वयं हृदय से शंकाकुल रहता है जिसके कारण वैसे आचरण करने वाले को १. विज्ञान या विशेषज्ञान के लिए जिसकी अभिलाषा है वह भिन्न-भिन्न गुरुओं से ज्ञान प्राप्त कर सकता है । एक गुरु को त्याग करता हुआ दूसरे गुरु के पास जाने से उसके गुरुत्याग का दोष नहीं लगता है ।