तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२३ तिरोभानशक्ति दुःखरूप मोहपंक में डाल देती है। लेकिन जिसमें शक्तिपात हुआ है उसके लिए तिरोभाव कोई कार्य नहीं करता है। इसमें भी कर्म आदि की अपेक्षा का निषेध पहले जैसे है। तिरोभाव में भी इच्छा की विचित्रता के कारण केवल इस देह के द्वारा दुःख आदि फल का भोग मात्र होता है, अथवा दीक्षा आदि समयचर्चा, गुरु, देव अग्नि आदि की सेवा या निन्दन या उभय का होना पहले शिव शासन में रहकर बाद में उसके त्याग करनेवाले के समान होता है। उसमें भी इच्छा की विचित्रता के कारण तिरोधानशक्ति के अन्तर्गत रहकर भी स्वयं शक्तिपात का पात्र बन जाता है या मरने पर बन्धु या गुरु की कृपा के द्वारा शक्तिपात प्राप्त करता है। इस प्रकार अपने आत्मस्वरूप में पंचकृत्य सम्पादन करने का अनुसन्धान होने पर वह स्वयं परमेश्वर ही बन जाता है। अतः अपने को खण्डितरूप में न देखे। निरावरणस्वभाव परमेश्वर जैसे अपने स्वातन्त्र्य से निज प्रकाशमय स्वरूप को आवृत्त कर देते हैं उसी प्रकार उसे खोल भी देते हैं। उनकी जो अप्रबुद्ध स्थिति है वे उस स्थिति में रहकर प्रबुद्ध के सदृश आचरण भो करते है। फिर भी वे प्रबुद्ध हो जाते है, अतः शक्तिपात निरपेक्ष है। श्री अभिनवगुप्तपादाचार्य द्वारा रचित तन्त्रसार के शक्तिपात प्रकाशन नामक ग्यारह आह्निक है।