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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

१४० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ के कारण है और गुरुओं के कथन के अनुसार शक्ति ही पूजनीय है। उस पूजन क्रम में पाँच अवस्थाएँ हैं जो जाग्रदादि हैं¹ और जो षष्ठ है वह अनुत्तर नामक स्वभावदशा है जिसका अनुसन्धान सबमें होना चाहिए। अतः न्यास छः प्रकार के हैं, उसमें कारणरूपी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर सदाशिव और शक्ति आदि रूपों का अधिष्ठान अलग-अलग रूप से छत्तीस तत्त्वों में वर्तमान है। लौकिक तत्त्वों से परे भैरव भट्टारक के साथ अभिन्नता लाने वाले न्यास के द्वारा वह पूजक पूर्ण हो जाता है और उसमें भैरवभाव आ जाता है। इसलिए इस विषय की आवश्यकता क्या है—जैसे कहा गया है— अतः केवल अन्तर्याग से ही वास्तविक कृतकृत्यता आती है।² क्योंकि अन्तर्याग से ही वास्तविक समावेश की प्राप्ति होती है, तो भी बाहर भी याग करणीय है क्योंकि उससे परिच्छिन्नता दूर हो जाती है। जिस साधक में उस प्रकार समावेश की प्राप्ति नहीं होती है उसके लिए बहिर्याग ही मुख्य है। बहिर्याग के अभ्यास से समावेश लाभ होता है— उसमें जो पशुभाव वर्तमान है, उसे हटाने के लिए उसे अन्तर्याग करना उचित है। अन्तर्याग में दृढ़ निष्ठा या परिपक्वता न आने पर भी उस विषय में संकल्प के बल से ही विशुद्धता आती है। इसके अनन्तर जो दीक्षा की अभिलाषी है उसके अधिवास³ के लिए १. अवस्थाएँ पांच हैं जो जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्य और तुर्यातीत हैं अनुत्तर इनसे परे हैं अथच वह सबमें अनुस्यूत है। २. अन्तर्याग से ही जब स्वरूप प्राप्ति होती है तो बहिर्याग का क्या महत्त्व है, इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि मानसयाग किये बिना बाह्ययाग करने पर वह शुभ फल प्रदान नहीं करता है और उस याग से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। जहाँ बहिर्याग मुख्य है वहाँ भी अन्तर्यजन परम आव- श्यक समझा जाता है क्योंकि बहिर्याग के द्वारा आन्तर वृत्तियों का विकास सम्पन्न होता है। योगमार्ग में चलने वालों के लिये बाह्ययजन आन्तर क्रम में आरूढ़ होने के लिए एक सोपान है। बाह्यविधि ही किसी समय आन्तर क्रम में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए बाह्यविधि उपेक्षणीय नहीं है। ३. देवता, गुरु, शिष्य और भविष्य में जो दीक्षा शिष्य को दी जायेगी उन सभी में योग्यताधायक संस्कार ही अधिवास है। यागगृह में वास करना

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