तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४१ भूमिपरिग्रह, गणेश की अर्चना, कुम्भ और कलशों की पूजा, वेदी की अर्चना और हवन करना चाहिए। नित्य और नैमित्तिक दोनों कार्यों में स्थण्डिल आदि का अर्चन और हवन करना हैं। इस अधिवासनरूप कृत्य के द्वारा शिष्य में संस्कारयोग्यता का आधान होता है जैसे खट्टा के खा जाने से दाँतों का खट्टा हो जाने के समान यह संस्कार देवस्वरूप प्राप्त करना ही कर्तव्य है शिष्य में इस प्रकार उन्मुखभाव प्राप्त करना और गुरु के द्वारा इस प्रकार शिष्य को ग्रहण करना ही संस्कार है। याग के उपयोग में आने वाले द्रव्यों को परमेश्वर के तेज के द्वारा समृद्ध होकर यागगृह के अभ्यन्तर में स्थित हैं और उस तेज से समृद्ध होने के कारण वे पूजा के उपकरण होने के योग्य बन गये हैं—इस प्रकार से उनमें योग्यता अर्पित की जाती है। इसलिए उन न्यासों की आवश्यकता प्रतीत नहीं होता है। जैसे कि कहा गया है—'अन्तरङ्गभाव के अधिगत हो जाने पर तत्त्वों के सृष्टि- न्यास आदि से क्या लाभ है'। वही वास्तविक अन्तरंग है जो भैरवरूप है, वे ही अपने स्वरूप में सृष्टि-संहाररूप नाना विचित्रताओं को प्रकाशित करते हैं—इस प्रकाशन कार्य में वे ही पर्यन्तभूमि हैं या अन्तिम स्थिति है। इसी प्रकार से परस्पर मेलक योग से (कौलिक प्रक्रिया के अनुसार) प्राण, शरीर और बुद्धि आदि परमेश्वर स्वरूपता को प्राप्त किये हैं ऐसे चिन्तन करने के बाद बाहर और अन्दर पुष्प, धूप और तर्पण के द्वारा यथासम्भव पूजन करना चाहिए। शरीर, प्राण और बुद्धि में शूल और कमल-न्यास करना चाहिए जो निम्न प्रकार है आधार शक्ति के मूल में मूल शक्ति है, कन्द का स्थान लम्बिका तक है, कलातत्त्व के अन्त तक दण्ड है, ग्रन्थि मायात्मक है। शुद्धविद्यारूप कमल ही चतुष्किका है ही अधिवास शब्द का तात्पर्य है। यह अधिवासरूपी कृत्य गुरु शिष्य के लिए करते हैं। १. दीक्षा में आनेवाली वस्तुएँ निम्न प्रकार हैं—श्वेत पुष्प, तिल, व्रीहि, घृत, आम्रपल्लव, कुश, सिद्धार्थ, खड़ी, करणी, कतंरो, पाशबन्धनसूत्र, वार्घानी, शिवकुम्भ, २४ समिध्, परिधि (सपत्र शाखा ४), समिध्, दन्तकाष्ठ, चरुस्थाली, स्रुक्, स्रुव्, चावल, दूध, मण्डल की रचना के लिये पाँच प्रकार रंगीन चूर्ण, शिष्य की आँखें बन्द करने यो वस्त्र का खण्ड आदि।