भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

१४२] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ उस चतुष्किका पर सदाशिव भट्टारक स्थित हैं।१ वह महाप्रेतरूप हैं— प्रेत इसलिए है कि सभी वस्तुओं का विलयन उन्हीं में हुआ है। उस स्थिति में बोध की ही प्रधानता है, क्योंकि वेद्यरूप शरीर के नाश हो १. पूजन यथायथ सम्पन्न हो, इसलिए अध्वन्यास होना चाहिए। अतः अन्तर्याग के अन्तर्गत आसन का स्वरूप प्रदर्शित किया जा रहा है। यहाँ आसन ही अन्तरंग है। नाभि से चार अंगुल नीचे आधारशक्ति का स्थान है। कन्द नाभि तक विस्तृत है ऐसी कल्पना होनी चाहिए। उस कन्द के सबसे नीचे धरा, उसके ऊपर सुरा समुद्र जो अप् तत्त्व का व्यापक है। उसके बाद तेजस्तत्त्व का स्थान है जिससे मेय की परिच्छिन्नता आती है। वायु पोतरूपी है। इस प्रकार चार अँगुलियों से व्याप्त स्थान क्रमशः धरा आदि के स्थान समझने चाहिए। इन चार तत्त्वों का व्यापक व्योम है। इसके बाद कमल का नाल है जो लम्बिका (तालुरंध्र) तक विस्तृत है। तन्मात्राओं से कला तक तत्त्व समूह इस नाल में स्थित हैं। नाल में जो काँटें हैं वे भुवनों के प्रतिनिधियां हैं। उनके ऊपर जो ग्रन्थि है वह माया है। इस मायात्मक ग्रन्थि में धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य आदि स्थित हैं। इस ग्रन्थि के ऊपर शुद्ध विद्या का आसन है जिसके निचले भाग में माया का आवरण है जो स्वरूप का आच्छादक है, और ऊपर का भाग माया को ही आच्छादित करता है। शुद्धविद्या का यह आसन एक पलंग के सदृश है और जो दो आवरणों की बातें कही गयी हैं वे दो चद्दर के समान है। यह विद्यारूपी कमल में वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरिणी, बलविकरिणी, बलमथनी, भूतदमनी, मनोन्मनी आदि नौ शक्तियाँ और विभी, ज्ञाना, कृति, इच्छा, वागीशी, ज्वालिनी, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री आदि नौ शक्तियाँ कमल के दलों में स्थित हैं। इनके मध्य में मनोन्मनी है। कमल के दल, केसर, और मध्य भाग सूर्य, चन्द्र और अग्निरूप है जिनके अधिपति ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र है। इनके ऊपर ईश्वर है और ईश्वर के बाद सदाशिव है जो उस कमल पर शयान है। सदाशिव को महाप्रेत कहा गया है। यह महाप्रेत इसलिये है कि यह प्रकृष्ट स्थान जो शिवरूप है वहाँ तक जाता है—निम्नभूमि को नहीं जाता है। जितने मन्त्र, मन्त्रेश्वर प्रभृति हैं वे सदाशिवता को प्राप्तकर शिवतालाभ करते हैं। यह ऊर्ध्वदृष्टिसम्पन्न है क्योंकि यह प्रकाशोन्मुख है, मेय यहाँ दुर्बल है और वह सदा नादामर्शशील हैं।