तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४३ जाने से वहाँ नाद का परामर्शन उनका स्वरूप है। उनको नाभि से उदित और उनके मस्तक के तीन छिद्रों से निकली नादान्त के प्रान्तवति शक्ति, व्यापिनी और समानरूपी तीन अराएँ द्वादशान्त तक गयी हैं। इस प्रकार चिन्तन करना चाहिए। उनके ऊपर तीन शुद्ध कमलमय उन्मनापद है। इस विश्वमय भेदात्मक स्थिति ही आसनरूप है। उसी आसन में अधिष्ठाता के रूप में जो सबका व्यापक है ऐसे आधेयरूप अपनी इष्ट देवता की कल्पना होनी चाहिए। जहाँ सब भावों की समरसता आती है उस समस्वभाव में विश्वरूपी भावों का अर्पण ही पूजन है। उस विषय में तन्मयता ही ध्यान है। उस विषय में अन्तःकरण में परामर्शनरूप नादान्दोलन ही जप है। इस परामर्श क्रम से जो प्रबुद्धतारूप महान तेज के प्रदीप्त होने पर उसमें विश्व का समर्पण ही होम है। इस प्रकार पूजन के अनन्तर परिवाररूपी देवताओं को अग्निसे उत्पन्न स्फुलिंग (चिनगारियाँ) के समान ध्यान करते हुए उसी रीति से पूजन करना चाहिए। द्वादशान्त तक विस्तृत त्रिशूल को मूल से उत्पन्न हुए तथा देवीचक्र के अग्र तक जाने वाले जैसे चिन्तन करना चाहिए, इस प्रकार चिन्तन क्रमरहित होने पर पूजक खेचरता को प्राप्त करता है। मूलाधार से द्वादशान्त तक व्योम का आपूरणात्मिका यह खेचरी आकाश सञ्चार, आकाश में स्थिति आकाशरूप अमृत को पान करने वाली है।१ उस यागगृह को सब प्रकार उपकरणों से सम्पन्न करने के अनन्तर भगवती मालिनी या मातृकाओं को स्मरण करते हुए उन तेजोमय वर्णों से परिपूर्ण पुष्पाञ्जलि उठाई गयी है—इस प्रकार भावना करते हुए उन फूलों को अर्पित कर देना चाहिए। इसके अनन्तर अस्त्रामन्त्र ( फट् ) का यथासम्भव जप करते हुए सिद्धार्थ (श्वेत सर्षप), धान्य, चावल, लाज (लावा) आदि वस्तुओं को तेजोरूप में भावना करते हुए ईशान आदि दिशाओं के क्रम से विकिरण करना चाहिए—यह हुआ भूपरिग्रह। १. मूलाधार से तालु, भ्रूमध्य और ब्रह्मरंध्र आदि शून्यात्मक स्थानों से दण्ड के समान गमनशील और द्वादशान्त के ऊपर चार अंगुलि स्थान जो आकाशरूप है और जहाँ शक्ति, व्यापिनी और समना हैं उनके साथ तदात्मता प्राप्त करते हुये योगी परबोधानन्द रूप अमृत का सेवन करता है। यही सर्वोत्तम खेचरीरूपी महामुद्रा है।