भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

१४४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ इसके अनन्तर शुद्धविद्या तक व्याप्त आसन को अर्पित कर गणपति की पूजा होनी चाहिए। इसके बाद आनन्दद्रव्य (सुरा) से पूर्ण और अलंकृत कुम्भ को पूजन करना चाहिए। १ तब उसमें पूग (?) अर्पित कर उसमें मूल मन्त्र जो सब का अधिष्ठाता है उसका स्मरण विधिपूर्वक करने के बाद एकसौ आठ बार उस मन्त्र से कुम्भ को अभिमन्त्रित करना चाहिए। दूसरे कलश पर विघ्न के नाश के हेतु अस्त्र मन्त्र की अर्चना करनी चाहिए। इसके अनन्तर अपनी-अपनी दिशाओं में स्थित लोकपालों को जो अस्त्रों से सज्जित हैं २ पूजन करना चाहिए। इसके बाद दीक्षा प्राप्त होने के पहले शिष्य के हाथ में अस्त्र कलश को देना चाहिए और गुरु स्वयं कुम्भ को ग्रहण करें। इसके अनन्तर गृह तक स्थानों के विघ्न की शान्ति के लिए जलधारा देते हुए शिष्य के पश्चात् चलते हुए गुरु इस मन्त्र का पाठ करें— हे इन्द्र, आप अपने दिशा में विघ्न के नाश के उद्देश्य से कर्म के (दीक्षा रूप कर्म) अन्त तक शिवजी की आज्ञा से अवहित होकर रहें। जब देवता का नाम तीन अक्षरवाला हो तब भो शब्द ('हे शब्द) १. कुम्भ को ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में स्थापित कर मूलमन्त्र से उसका पूजन करना चाहिए। उसके बाँयी दिशा में कलश स्थापित करना चाहिए। पूजन के अनन्तर शिष्य अस्त्र कलश उठाकर उससे जल छिड़क कर आगे-आगे चलता है और आचार्य उसके पीछे, उनके हाथ में उस समय कुम्भ रहता है। इस प्रकार जलधारापातन और अनुगमन गृह के चारों ओर तक हो ताकि याग का सब प्रकार विघ्न का विनाश हो। इस प्रकार कार्य की समाप्ति होने के बाद कुम्भ ईशान कोण में ही स्थापित करना चाहिए और अस्त्र कलश को उसके दाहिने भाग में। २. लोकपालों के पूजन के साथ अष्टमातृकाओं जैसे इन्द्राणी आदि जो विभिन्न प्रकार आयुधों से भूषित हैं, पूजन होना चाहिए। यह याद रखना उचित है कि कलश और कुम्भ दोनों ही आम अश्वत्थ आदि पल्लवों से भूषित, फूल की माला और रक्षोघ्न तिलक, श्वेतवस्त्र युगल से सुशोभित होना चाहिए। जो जलधारा पातन की बातें कही गयी है, उसके सम्बन्ध में यह ज्ञातव्य है कि शिष्य पूर्वदिशा की ओर से चलते हैं और जब वह दक्षिण- पश्चिम दिशा में पहुँचता है तब गुरु 'भो-भो शक्र' इस मन्त्र का पाठ करेंगे।