तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४५ एक ही बार होना चाहिए। उसके बाद ईशान दिशा में कुम्भ को स्थापित करना चाहिए। विकिर के ऊपर अस्त्र कलश को स्थापित कर देना चाहिए। स्थण्डिल के मध्यभाग में परमेश्वर का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर अग्निकुण्ड को परमेश्वर की शक्ति के रूप में चिन्तन करते हुए¹ उसमें ( कुण्ड में ) अग्नि को प्रज्वलित कर हृदय के अन्तःस्थल में स्थित बोधरूपी अग्नि के साथ उसकी तदात्मता के चिन्तन करते हुए और मन्त्र के परामर्शन करते हुए उस प्रज्वलित अग्नि को शिवाग्नि रूप में चिन्तन करना चाहिए।² वहाँ मातृका और मालिनियों का न्यास और अर्चना के अनन्तर मन्त्रों का तर्पण घृत और तिलों से होना चाहिए। अर्घपात्र के जल से प्रोक्षण ही तिल और घृत का संस्कार है। परमेश्वर- सम्बन्धी अभेद दृष्टि ही स्रुक् और स्रुव का संस्कार है। इसके अनन्तर यथाशक्ति हवन के बाद स्रुक् स्रुव् दोनों को उर्ध्व और अधोमुख स्थापित कर जो शक्ति शिवरूप हैं और दोनों परस्पर उन्मुख हैं इस प्रकार चिन्तन करते हुए दोनों पैरको सम ( एक दूसरे से मिलित ) रखकर खड़े होकर द्वादशान्त रूपी गगन में उदित शिवरूपी पूर्णचन्द्र से निःसृत परमामृत धारा पतित हो रही है इस प्रकार भावना करते हुए वौषडान्त मन्त्रके १. अग्निकुण्ड वस्तुतः कुण्डलिनी शक्ति का ही बाहरी रूप है। कुण्डलिनी शक्ति परमेश्वर की क्रियाशक्तिरूप है। अतः बाहर भी उसकी उसी प्रकार भावना होनी चाहिए। इस प्रकार भावना ही परम संस्कार है। केवल इतना ही नहीं शरीर, स्थण्डिल, लिङ्ग, पात्र, जल, अनल, पुष्प और शिष्य आदि में भावनात्मक संस्कार होना पहली आवश्यकता है। लेकिन जिसके हृदय में इस प्रकार भावना की उत्पत्ति होना कठिन है उसके लिए बाहरी अनुष्ठान आवश्यक है। कुण्ड का पूजन 'ॐ क्रियाशक्त्यात्मने कुण्डाय नमः' इस मन्त्र से किया जाता है। २. वागीश्वरी के गर्भ से अग्नि का जन्म होता है, इसलिए अग्निकुण्ड में त्रिकोणाकार स्थान ही भगवती वागीश्वरी की योनि है, वह क्रियात्मक है, ज्ञान ही शुक्रकण है। ताँवे के पात्र में प्रज्वलित अग्नि को लाकर उसे शिववीर्य के रूप में चिन्तन करते हुए विद्यारूपी योनि में स्थापित करना चाहिए। यह हुआ गर्भाधान। इस क्रिया के अनन्तर पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण आदि कर्म के अनन्तर उस अग्नि में होमादि कार्यों का सम्पादन होता है। १०