तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ उच्चारण के साथ पूर्णाहुति देनी चाहिए और जब तक घृत रहे तब तक स्थिर रहना चाहिए । यह पूर्णाहुति सब मन्त्रचक्रों का सन्तर्पण करती है । इसके बाद प्रोक्षित चरु लाकर स्थण्डिल, कलश और अग्नि में एक- एक भाग निवेदन कर एक भाग शेष रखकर, शिष्य को एक भाग दें । १ इसके अनन्तर दन्तकाष्ठ का प्रकरण है । २ उसका पतन अग्निकोण, दक्षिण, नैर्ऋत या अधः हो तो शुभ नहीं होती है। इसके निराकरण के लिए अस्त्र मन्त्र से होम करना उचित है । इसके अनन्तर सब विक्षेपों ( चञ्चलता ) को त्याग करते हुए भविष्य में होने वाले मन्त्र के दर्शन की योग्यता की प्राप्ति उसमें हो इसके लिए उस शिष्य के नेत्र को बाँधकर याग मण्डप में प्रवेश कराकर और घुटने पर उसे बिठालाकर उसके द्वारा पुष्पाञ्जलि फेकवाना चाहिए ३ । इसके १. चरु से होमकार्य सम्पन्न कर जो एक भाग चरु शेष रहता है उस भाग केवल शिष्य ही नहीं आचार्य भी सेवन करते हैं । जो मुक्तिकामी है वह पलाशपत्र में और मुक्तिकामी पिपल के पत्ते में भोजन करें । भोजन के अनन्तर आचमन तथा मूलमन्त्र के द्वारा षडंगन्यास से सकलीकरणरूप क्रिया करणीय है । २. शिष्य में सकलीकरण सम्पन्न होने पर गुरु शिष्य के हाथ में वृद्धांगुष्ठि से मध्यमांगुलि तक लम्बा दाँत के मञ्जन के लिए एक दन्तकाष्ठ प्रदान करते हैं । दाँतों को उत्तमरूप से साफ करने के अनन्तर शिष्य उस दन्तकाष्ठ को धोकर जमीन पर फेंकता है । अगर वह ऊपर मुह होकर गिरता है तो मोक्ष अधिगत होता है, अधोमुख होकर गिरे तो फल मृत्यु है । पूर्वमुख होकर गिरता है तो योगसिद्धि होती है । जहाँ फल उत्तम है वहाँ कुछ कृत्य की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन अशुभ फल हो तो जपक्रिया की आवश्यकता है । ३. शिष्य के हाथ में एक पुष्प प्रदान करने के पहले उसकी आँखों को कपड़े से बाँध देना चाहिए और उसके हाथ पकड़ कर परदे के भीतर ले जाना चाहिए । बाद में अन्य क्रिया समाप्त करने के अनन्तर उसे परदे के आड़ से बाहर लाकर देवता के अभिमुख स्थापित कर उसके हाथ में एक फूल देकर आचार्य उससे कहें—फूल फेको । जब वह फूल फेकता रहता है तब आचार्य मूल मन्त्र का उच्चारण करते रहते हैं और सावधानी से