भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४७ बाद अचानक उसके नेत्र के बन्धन खोल दिये जाने पर शक्तिपातरूपी अनुग्रह उसमें सम्पन्न हो जाने के कारण उसकी इन्द्रियों की मलिनता दूर हो जाती हैं, अतः उस स्थान में मन्त्र को सन्निहित ( निकट स्थित ) और प्रत्यक्षरूप में देखकर उस मन्त्र के साथ उसकी तन्मयता आ जाती है। जिनकी इन्द्रियाँ अनुग्रह के कारण मलिनता से मुक्त होती हैं उनके सामने मन्त्र का सन्निधान प्रत्यक्ष होता है जिससे ( जिसके दर्शन से ) पशुओं का भय उत्पन्न होता है । इसके उपरान्त शिवहस्तविधि¹ है। आचार्य अपने दाहिने हाथ में दीप्त देवताचक्र का पूजन करने के बाद उस हाथ को शिष्य के मस्तक, हृदय, नाभि आदि स्थानों में पाशों को जलाते हुए रखते हैं। इसके बाद बायें में शुद्ध तत्त्वों के आप्यायन करने वाले को पूजन करने के अनन्तर प्रणाम करना चाहिए। इसके अनन्तर भूतवलि और दिग् वलि हैं जो मद्य, मांस और जल से पूर्ण वलि है जिसे याग गृह के बाहर अर्पित करना चाहिए और बाद में आचमन करना चाहिए। तब आचार्य स्वयं चरु का भोजन करने के बाद शिष्य की आत्मा के साथ एकत्व अपनाते हुए प्रबुद्धास्थिति में वर्तमान रहें। शिष्य निद्रित रहने के बाद अगर प्रातःकाल अशुभ स्वप्न की बातें करें तो आचार्य उसका भेद उसे निरीक्षण करते हैं कहाँ फूल गिरता है। इसके बाद शिष्य का नेत्रबन्धन खोल दिया जाता है। उस समय शिष्य के अज्ञान रूपी उस बन्धन खोल दिये जाने पर वह अपने सम्मुख सभी मन्त्रों और विद्याओं को प्रत्यक्ष देखता है। उस समय उसकी प्रबुद्धदशा जाग्रत हो जाती है और सहस्र जन्म में भी जिस भगवत्स्वरूप को देखने में वह असफल रहा सहसा उसके दर्शन से विस्मित होकर वह जमीन पर दण्डवत् गिर पड़ता है। १. गुरु शिष्य के मस्तक पर आशीर्वाद के रूप में शिवहस्त प्रदान करते हैं। गुरु पहले अपने दाहिने हाथ में अमितोज्ज्वल शिवजी के स्वरूप को ध्यान करते हैं। उनके ध्यान का स्वरूप इस प्रकार है—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव आदि में अधिष्ठित शिव उनके हाथ में दीप्तमूर्ति होकर विराजमान हैं। उनकी ( आचार्य की ) पाँच अंगुलियाँ चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया रूपी पाँच शक्तियों से अधिष्ठित होकर पाशों का दहन करती हैं। उस हाथ से विभिन्न स्थानों के स्पर्श से पाशों के अंकुर विनष्ट हो जाते हैं।