भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 294 में से

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पृष्ठ 229

१४८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ न बतलावें। क्योंकि उससे उसके मन में सन्देह और शंका उठ सकते हैं, इसलिए केवल अशुभ का निराकरण अस्त्र मन्त्र से करना चाहिए ! इसके अनन्तर पहले जैसे परमेश्वर के पूजन करने के अनन्तर शिष्य के प्राण में प्रवेश करते हुए उसके हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त आदि छः स्थानों में स्थित कारण षटकों को स्पर्श³ करते हुए प्रत्येक स्थल में आठ-आठ संस्कार⁴ सम्पन्न हो गये हैं इस प्रकार चिन्तन करते हुए शिष्य के प्राणों को उन-उन स्थानों में कुछ समय तक विश्राम प्राप्त कराकर फिर अपने स्थानों में लौट आवें । इस प्रकार उपाय से अड़तालिस संस्कारों से शिष्य में रुद्रांशपात सम्पन्न हो जाता है और जिसके फलस्वरूप शिष्य समयी५ बन जाता है। इसके अनन्तर उसे १. कारण षट्क छः हैं जो निम्न प्रकार हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव और शिव हैं जो क्रमशः हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट और ब्रह्मरन्ध्र आदि स्थानों में स्थित हैं। गुरु ऊर्ध्वरेचन की क्रिया से अपने शरीर से निकल कर शिष्य के शरीर में प्रवेश करते हैं और इन देवताओं से शिष्यचैतन्य को मुक्त करते हैं। २. संस्कार कुल अड़तालिस हैं जो निम्न प्रकार हैं। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकर्म, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, व्रत- बन्ध, ऐष्टिक, मौञ्जी, भौतिक, सौमिक, गोदान, विवाह, अष्टका, पार्वणी, श्राद्ध, श्रावणी, आग्रायणी, चैत्री, आश्वयुजी अग्न्याधान, अग्निहोत्र, पौर्णमास, दर्श, चातुर्मास्य, पशूद्बन्ध, सौत्रामणि, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोड़शी, वाजपेय, आतोर्याम, अतिरात्र, हिरण्यपादादिमख, अश्वमेध, वानप्रस्थ, पारिव्राज्य, दया, क्षमा, अनसूया, शुद्धि, सत्कार, मंगल, अकार्पण्य, अस्पृहा। ब्रह्मादि कारणषट्क जो हृदय आदि स्थानों में स्थित हैं गुरु के बोधरूपी स्पर्श से शिष्य के नवीन शरीर के गर्भाधानादि सभी संस्कार सम्पन्न हो जाते हैं और फलस्वरूप उसके आहार और बीज से जो कुछ दोष पहले उसमें वर्तमान था उसका निराकरण हो जाता है और वह द्विज बन जाता है। ३ समय शब्द का तात्पर्य आगमसम्मत नियमों का पालन है। जो शिष्य उन नियमों का पालन करता है उसे समयी कहते हैं। समयों के पालन से शिष्य में ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार मिलता है। जात्युद्धार, द्विजत्व- लाभ और रुद्रांशता की प्राप्ति इन तीन कार्यों से समयी का शुद्ध-संस्कार

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