भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 294 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 230

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४९ ( शिष्य को ) पूज्य मन्त्र पुष्प आदि के साथ अर्पण करना चाहिए। बाद में समयों को उसे बतला देना चाहिए। गुरु को सर्वथा भक्ति करना, उसी प्रकार शास्त्र तथा देवता में भी करना है। उसके प्रतिकूल विषयों से पराङ्मुख रहना है, गुरु के समान गुरु के पुत्र आदि के प्रति उसी प्रकार व्यवहार रखना है। विद्या सम्बन्ध जिनके साथ है और जिनकी दीक्षा उसके पहले हो गयी है उनको भी उसी प्रकार देखना है। यौन सम्बन्ध से उनकी उत्पत्ति हुई इस प्रकार से देखना न चाहिए इससे गुरु के प्रति भक्ति वास्तव में होती है—यह स्वतः नहीं होता है—ऐसा जानना चाहिए। वन्ध्या स्त्रियों को घृणा के पात्र के रूप में न देखना चाहिए। देवता का नाम, गुरु का नाम तथा मन्त्र पूजा के समय भिन्न अन्य समय उच्चारित न करना चाहिए। गुरु के द्वारा व्यवहृत शय्या आदि व्यवहार न करना चाहिए। लौकिक खेल आदि गुरु के समीप न करना चाहिए। गुरु से भिन्न किसी व्यक्ति पर उत्कर्ष विचार नहीं रखना चाहिए। श्राद्ध आदि कार्यों में गुरु को ही पूजन करना चाहिए। नैमित्तिक कार्यों में शाकिनी आदि शब्दों का परिहार करना चाहिए। पर्व दिनों में पूजन करना चाहिए। जो निम्न दृष्टि सम्बन्त वैष्णवादि हैं उनकी संगति छोड़ देना चाहिए। इस शास्त्र के अनुशासन में जो लोग स्थित हैं उन्हें पूर्व जाति के रूप में न देखना चाहिए। गुरुवर्ग जब घर में आ जाते हैं तब शक्ति के अनुसार याग करना चाहिए। निम्न मार्ग में स्थित किसी वैष्णव आदि को शास्त्र सम्बन्धी ज्ञान के कौतूहल से उसके द्वारा गुरु बनाये जाने पर भी उसे त्याग कर देना चाहिए। किसी वैष्णव को उत्कर्ष बुद्धि से देखना न चाहिए। जो लिङ्ग चिह्नधारी है उनके साथ समाचार मेलन न करना चाहिए। उन्हें यथाशक्ति पूजन करना चाहिए। संशय त्यागना चाहिए। चक्र में स्थित रहकर यह अन्त्यज है या यह ब्राह्मण है इस प्रकार जाति सम्बन्धी भेदभावना मन में न रखना चाहिए। शरीर से भिन्न किसी

उत्पन्न होता है। वागीश्वरी के गर्भ में जन्म होने पर उसका वास्तविक द्विजत्वप्राप्ति होती है और अड़तालिस संस्कारों से उसकी द्विजता में परिपूर्णता आती है।