तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४९ ( शिष्य को ) पूज्य मन्त्र पुष्प आदि के साथ अर्पण करना चाहिए। बाद में समयों को उसे बतला देना चाहिए। गुरु को सर्वथा भक्ति करना, उसी प्रकार शास्त्र तथा देवता में भी करना है। उसके प्रतिकूल विषयों से पराङ्मुख रहना है, गुरु के समान गुरु के पुत्र आदि के प्रति उसी प्रकार व्यवहार रखना है। विद्या सम्बन्ध जिनके साथ है और जिनकी दीक्षा उसके पहले हो गयी है उनको भी उसी प्रकार देखना है। यौन सम्बन्ध से उनकी उत्पत्ति हुई इस प्रकार से देखना न चाहिए इससे गुरु के प्रति भक्ति वास्तव में होती है—यह स्वतः नहीं होता है—ऐसा जानना चाहिए। वन्ध्या स्त्रियों को घृणा के पात्र के रूप में न देखना चाहिए। देवता का नाम, गुरु का नाम तथा मन्त्र पूजा के समय भिन्न अन्य समय उच्चारित न करना चाहिए। गुरु के द्वारा व्यवहृत शय्या आदि व्यवहार न करना चाहिए। लौकिक खेल आदि गुरु के समीप न करना चाहिए। गुरु से भिन्न किसी व्यक्ति पर उत्कर्ष विचार नहीं रखना चाहिए। श्राद्ध आदि कार्यों में गुरु को ही पूजन करना चाहिए। नैमित्तिक कार्यों में शाकिनी आदि शब्दों का परिहार करना चाहिए। पर्व दिनों में पूजन करना चाहिए। जो निम्न दृष्टि सम्बन्त वैष्णवादि हैं उनकी संगति छोड़ देना चाहिए। इस शास्त्र के अनुशासन में जो लोग स्थित हैं उन्हें पूर्व जाति के रूप में न देखना चाहिए। गुरुवर्ग जब घर में आ जाते हैं तब शक्ति के अनुसार याग करना चाहिए। निम्न मार्ग में स्थित किसी वैष्णव आदि को शास्त्र सम्बन्धी ज्ञान के कौतूहल से उसके द्वारा गुरु बनाये जाने पर भी उसे त्याग कर देना चाहिए। किसी वैष्णव को उत्कर्ष बुद्धि से देखना न चाहिए। जो लिङ्ग चिह्नधारी है उनके साथ समाचार मेलन न करना चाहिए। उन्हें यथाशक्ति पूजन करना चाहिए। संशय त्यागना चाहिए। चक्र में स्थित रहकर यह अन्त्यज है या यह ब्राह्मण है इस प्रकार जाति सम्बन्धी भेदभावना मन में न रखना चाहिए। शरीर से भिन्न किसी
उत्पन्न होता है। वागीश्वरी के गर्भ में जन्म होने पर उसका वास्तविक द्विजत्वप्राप्ति होती है और अड़तालिस संस्कारों से उसकी द्विजता में परिपूर्णता आती है।
१५० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ तीर्थ और क्षेत्र को अधिक सम्मान से नहीं देखना चाहिए। मन्त्र का हृदय जो विमर्शरूप है उसका निरन्तर स्मरण करना चाहिए। इस प्रकार समयों का श्रवण करने के बाद गुरु के समीप जाकर उन्हें प्रणाम करने के अनन्तर धन दार और इतना तक कि शरीर भी दक्षिणा के रूप में देकर उन्हें तुष्ट कर जिन्होंने पहले दीक्षा प्राप्त कर ली हैं उन्हें तथा दीन और अनाथों को तृप्त करना चाहिए। आगे आनेवाली विधि से मूर्तिचक्र का तर्पण करना चाहिए। इस विधि से शिष्य समयी बन जाता है। समयी बन जाने पर मन्त्र के अभ्यास में, नित्य पूजा में, शास्त्र के श्रवण और अध्ययन में अधिकार आता है। नैमित्तिक कार्यों के लिए गुरु से ही प्रार्थना करनी चाहिए। इतना तक सामयिक विधि है। सभी अध्वाओं को अपने स्वरूप में चिन्तन करने के बाद अपने पूर्ण आत्म स्वरूप को अवलोकन करें। उसके बाद द्वादशान्त तक व्याप्त शिष्य के स्वरूप को अनुग्रह रूपी बोध से देखें—उसी से शिष्य समयी १ बन जाता है। श्री अभिनवगुप्त द्वारा रचित तन्त्रसार का समयीदीक्षा प्रकरण नामक त्रयोदश आह्निक है। १. समय शब्द से आगमशास्त्रों में निर्धारित अवश्य पालनीय नियमों को समझना चाहिए। समयदीक्षा प्राप्त होने पर शास्त्रों का अध्ययन, श्रवण, पूजन, जप, ध्यान आदियों में अधिकार प्राप्त होता है। गुरु के द्वारा कथित आचारों का पालन, ध्यान आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है। आगे चलकर समयी पुत्रक दीक्षा प्राप्त कर सकता है। समयी की पाश- शुद्धि अवश्य होती है, पाशों का निर्मूलन नहीं होता, इसलिए पूर्णता की प्राप्ति नहीं होती है। इस दीक्षा के द्वारा परतत्त्व की ओर चलने का मार्ग खुल जाता है। 'सम्यगयनं ज्ञानमस्मादिति' ज्ञान का सम्यक् अयन इससे होता है इसलिए इसे समय कहते हैं।
अथ चतुर्दशमाह्निकम् अथ पुत्रकदीक्षाविधिः । स च विस्तीर्णः तन्त्रालोकात् अवधार्यः । संक्षिप्तस्तु उच्यते । समय्यन्तं विधिं कृत्वा तृतीयेऽह्नि त्रिशूलाब्जे मण्डले सामुदायिकं यागं पूजयेत्, तत्र बाह्यपरिवारं द्वारदेवताचक्रं च बहिः पूजयेत्, ततो मण्डलपूर्वभागे ऐशकोणात् आरभ्य आग्नेयान्तं पंक्ति- क्रमेण गणपतिं गुरुं परमगुरुं परमेष्ठिनं पूर्वाचार्यान् योगिनीचक्रं वागीश्वरौ क्षेत्रपालं च पूजयेत् । तत आज्ञां समुचिताम् आदाय शूल- मूलात् प्रभृति सितकमलान्तं समस्तम् अध्वानं न्यस्य अर्चयेत्, ततो मध्यमे त्रिशूले मध्यरायां भगवती श्रीपराभट्टारिका भैरवनाथेन सह, वामारायां तथैव श्रीमदपरा, दक्षिणारायां श्रीपरापरा, दक्षिणे त्रिशूले मध्ये श्रीपरापरा, वामे त्रिशूले मध्ये श्रीमदपरा, द्वे तु यथास्वम् । एवं सर्वस्थानाधिष्ठातृत्वे भगवत्याः सर्वं पूर्णं तदधिष्ठानात् भवति इति । ततो मध्यशूलमध्यरायां समस्तं देवताचक्रं लोकपालास्त्रपर्यन्तम् अभिन्नतयैव पूजयेत् तदधिष्ठानात् सर्वत्र पूजितम् । ततः कुम्भे कलशे मण्डले अग्नौ स्वात्मनि च अभेदभावनया पञ्चाधिकरणम् अनुसन्धिं कुर्यात्, ततः पर- मेश्वराद्वयरसबृंहितेन पुष्पादिना विशेषपूजां कुर्यात् । किं बहुना— तर्पणनैवेद्यपरिपूर्णं वित्तशाठ्यविरहितो यागस्थानं कुर्यात् । असति वित्ते तु महामण्डलयागो न कर्तव्य एव । पशूंश्च जीवतो निवेदयेत् । तेऽपि हि एवम् अनुगृहीता भवन्ति, इति कारुणिकतया पशुविधौ न विचिकित्सेत् । ततोऽग्नौ परमेश्वरं तिलाज्यादिभिः संतर्प्य तदङ्गेऽन्यं पशुं वपाहोमार्थं कुर्यात्, देवताचक्रं तद्रूपया तर्पयेत्, पुनर्मण्डलं पूजयेत्, ततः परमेश्वरं विज्ञप्य सर्वाभिन्नसमस्तषडध्वपरिपूर्णम् आत्मानं भावयित्वा शिष्यं पुरोऽवस्थितं कुर्यात् । परोक्षदीक्षायां जीवन्मृतरूपायाम् अग्रे तं ध्यायेत्, तदीयां वा प्रतिकृतिं दर्भगोमयादिमयीम् अग्रे स्थापयेत् । तथाविधं शिष्यम् अर्घपात्रविप्रुड्प्रोक्षितं पुष्पादिभिश्च पूजितं कृत्वा समस्तमध्वानं तद्देहे न्यसेत् । तत इत्थं विचारयेत्, भोगेच्छोः शुभं न शोधयेत् । मुमु- क्षोस्तु शुभाशुभम् उभयमपि । निर्बीजायां तु समयपाशान् अपि शोधयेत्, सा च आसन्नमरणस्य अत्यन्तमूर्खस्यापि कर्तव्या इति परमेश्वराज्ञा, तस्यापि तु गुरुदेवताग्निभक्तिनिष्ठत्वमात्रात् सिद्धिः । अत्र च सर्वत्र
१५२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १४ वासनाग्रहणमेव भेदकम्—मन्त्राणां वासनानुगुण्येन तत्तत्कार्यकारित्वात् । एवं वासनाभेदमनुसंधाय मुख्यमन्त्रपरामर्शविशेषेण समस्तमध्वानं स्वदेहगतं शिवाद्वयभावनया शोधयेत्। एवं क्रमेण पादाङ्गुष्ठात् प्रभृति द्वादशान्तपर्यन्तं स्वात्मदेहस्वात्मचैतन्याभिन्नीकृतदेहचैतन्यस्य शिष्यस्य आसाद्य तत्रैव अनन्तानन्दसरसि स्वातन्त्र्यैश्वर्यसारे समस्तेच्छाज्ञान- क्रियाशक्तिनिर्भरसमस्तदेवताचक्रेश्वरे समस्ताध्वभरिते चिन्मात्राशेष- विश्वभावमण्डले तथाविधरूपैकीकारेण शिष्यात्मना सह एकीभूतो विश्रान्तिमासादयेत्, इत्येवं परमेश्वराभिन्नोऽसौ भवति । ततो यदि भोगे- च्छुः स्यात् ततो यत्रैव तत्त्वे भोगेच्छा अस्य भवति तत्रैव समस्तव्यस्त- तया योजयेत् । तदनन्तरं शेषवृत्तये परमेश्वरस्वभावात् झटिति प्रसृतं शुद्धतत्त्वमयं देहम् अस्मै चिन्तयेत्, — इत्येषा समस्तपाशवियोजिका दीक्षा। ततः शिष्यो गुरुं दक्षिणाभिः पूर्ववत् पूजयेत् । ततोऽग्नौ शिष्यस्य विधिं कुर्यात्, श्रीपरामन्त्रः अमुकस्यामुकं तत्त्वं शोधयामि, इति स्वाहान्तं प्रतितत्त्वं तिस्र आहुतयः, अन्ते पूर्णा वौषडन्ता । एवं शिवान्त- तत्त्वशुद्धिः, ततो योजनिकोक्तक्रमेण पूर्णाहुतिः । भोगेच्छोः भोगस्थाने योजनिकार्थमपरा, शुद्धतत्त्वसृष्ट्यर्थमन्या । ततो गुरोः दक्षिणाभिः पूजनम्, इत्येषा पुत्रकदीक्षा । यत्र वर्तमानमेकं वर्जयित्वा भूतं भविष्यच्च कर्म शुध्यति ॥ अन्तः समस्ताध्वमयीं स्वसत्तां बहिश्च संधाय विभेदशून्यः । शिष्यस्य धोप्राणतनूर्निजासु तास्वेकतां संगमयेत्प्रबुद्धः ॥ शिष्यैकभावं झटिति प्रपद्य तस्मिन्महानन्दविबोधपूर्णे । यावत्स विश्राम्यति तावदेव शिवात्मभावं पशुरभ्युपैति ॥ जे सहु एकीभाउलये विणु अच्छइ एहु विबोह समुद्द । सो पशु भइरव हो इलये विणु अन्तर्नावजिउ अस असमुद्दु ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे पुत्रकदीक्षाप्रकाशनं नाम चतुर्दशमाह्निकम् ॥१४॥
चतुर्दश आह्निक अब पुत्रकदीक्षा १ की विधि है। यह विधि अत्यन्त विस्तीर्ण है' तन्त्रालोक ग्रन्थ से इसे जान लेना चाहिए। संक्षिप्तविधि का विवरण दिया जा रहा है। समयी के लिए किए जाने वाले कृत्यों को समाप्तकर तीसरे दिन त्रिशूल और कमल चिह्नित मण्डल में सामुदायिक याग और पूजन करना चाहिए। मण्डल के बाहर बाह्यपरिवार और द्वारदेवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर मण्डल के पूर्वभाग में ईशान कोण से आरम्भकर अग्निकोण तक पंक्तिक्रम से गणपति, गुरु, परमगुरु, परमेष्ठिगुरु पूर्वतन आचार्य, योगिनीचक्र, वागीश्वरी और क्षेत्रपालों को पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर समुचित आज्ञा लेकर त्रिशूल २ के मूल से श्वेत कमल तक स्थानों में अध्वाओं के न्यास के बाद अर्चना करनी चाहिए। इसके बाद मध्यस्थ त्रिशूल के मध्यस्थअरा में भगवती श्रीपराभट्टारिका को भैरवनाथ के साथ, बायी अरा मे' उसी प्रकार श्री भगवती अपरा भट्टारिका, दाहिनीअरा में श्री भगवती परापरा भट्टारिका का पूजन तथा न्यास होना चाहिए। दक्षिण त्रिशूल के मध्य में श्री परापरा, वाम त्रिशूल के मध्य में श्री भगवती अपरा भट्टारिका का पूजन होना चाहिए। अन्य दो १. समयदीक्षा के अनन्तर पुत्रकदीक्षा की व्यवस्था है। पुत्रक शब्द का तात्पर्य पुत्र से है। शिष्य आचार्य का निजपुत्र न होते हुए भी पुत्रतुल्य है। पुत्रकदीक्षा से जो दीक्षा प्राप्त करता है वह मोक्षार्थी है, भोगेच्छु नहीं है। जो भोगरूप फल का अभिलाषी है वह भोगार्थी है। मोक्षार्थी शिष्य दो प्रकार हैं—एक है पुत्रक और दूसरा आचार्य है। २. त्रिशूल तीन हैं जिनके मध्य में एक स्थित है और उसके दाहिने में एक और बायें में एक है। प्रत्येक में तीन तीन अराएँ हैं। इन अराओं में तीन मुख्य देवियाँ स्थित हैं इन त्रिशूलो में एक हैं शाम्भव, दूसरा शक्ति और तीसरा आणव है। द्वादशान्त तक शाम्भव शूल व्याप्त है उससे चार अंगुलि नीचे शाक्त शूल की स्थिति है, फिर उससे चार अंगुलि नीचे आणव शूल स्थित है।
१५४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १४ अराओं के दक्षिण तथा वाम के त्रिशूलों में अन्य दो-दो देवियों का पूजन होना चाहिए। अतः सब स्थानों में भगवती शक्तियों का अधिष्ठान होने के कारण सभी स्थितियाँ पूर्ण हो जाती हैं। इसके बाद मध्यस्थ अरा में सब देवताचक्र, लोकपाल और उनके आयुधों की अभिन्नता बोध को अपनाते हुए पूजन करना चाहिए, उनके अधिष्ठान के कारण एक स्थान के पूजन से सभी स्थानों में पूजन सम्पन्न होता है। उसके उपरान्त कुम्भ, कलश, मण्डल, अग्नि और निज आत्मा की अभेदभावना के द्वारा इन पाँचों अधिकरणों का अनुसन्धान करना चाहिए¹। इसके उपरान्त परमेश्वराद्वय-रस से पुष्ट पुष्प आदि से विशेषपूजा करनी चाहिए। अधिक क्या कहूँ-तर्पण, नैवेद्य आदि उपकरणो से परिपूर्ण त्रिशूलों में जो मध्य में स्थित है उसके दाहिने और बायें में क्रमशः परापरा तथा अपरा शक्तियाँ अधिष्ठित हैं और मध्य में पराशक्ति स्थित है। त्रिशूल जो दाहिने है वह श्री परापरा देवी के द्वारा अधिष्ठित है। उस त्रिशूल के दाहिने तथा बायी अराएँ श्री परा और अपरा देवियों के द्वारा अधिष्ठित हैं। इस विवरण से प्रतीत होता है कि प्रत्येक त्रिशूल के मध्य भाग क्रमशः श्री परा, श्री परापरा और श्री अपरा देवियों के द्वारा अधिष्ठित है, मध्यस्थ त्रिशूल का मध्यभाग श्रीपरा देवी के द्वारा अधिष्ठित है अतः अन्य दो शक्तियाँ उनके अंग है और वह स्वयं अंगी है। यद्यपि त्रिशूलों में देवियाँ स्थित हैं तो भी देवियाँ देवरहित नहीं हैं, उनके भैरव भी उनके साथी हैं जैसे मध्य में भैरवसद्भाव, दक्षिण में रतिशेखर और वामभाग में नवात्मा स्थित हैं। श्री परादेवी पूर्णचन्द्र प्रतिमा हैं अर्थात् श्वेतवर्ण है, श्री परापरा रक्तवर्ण है और वाम में श्री अपरादेवी कृष्णपिंगल वर्ण हैं। १. यद्यपि कुम्भ, कलश आदि एक दूसरे से भिन्न है तो भी मैं ही सभी जगह स्थित हूँ इस प्रकार अद्वयभावना का अनुसन्धान यथायथ होने पर उनके द्वैतरूप समाप्त हो जाता है। इस प्रकार शिवात्मक अद्वयव्याप्ति का अनुसन्धान जिससे होना सम्भव नहीं है वह मध्यनाड़ी के प्रयोग से अद्वयमार्ग में प्रवेश करता है। अर्थात् बहिर्याग न करके मध्यनाड़ी में त्रिशूल की कल्पना कर उसके सहारे अद्वयबोध में स्थित हो सकता है।
आ. १४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १५५ यागस्थान की रचना करनी चाहिए, इस विषय में वित्तशाठ्य १ न होना चाहिए। धन की कमी हो तो महामण्डलयाग नहीं करना चाहिए। जीवित पशुओं को निवेदित करना चाहिए। इसी उपाय से उन पर अनुग्रह होता है अतः उन पर करुणाभाव दिखलाकर शास्त्रविधि पर सन्देह न करना चाहिए। इसके बाद अग्नि में परमेश्वर को तिल और घृत से तर्पण कर उस अग्नि में दूसरे पशु को वपा होम के लिए रखना चाहिए। फिर मण्डल का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर परमेश्वर से विज्ञापित कर सब से अभिन्न षडर्ध परिपूर्ण अपने स्वरूप को चिन्तन करते हुए शिष्य को अपने सम्मुख स्थापित करना चाहिए। परोक्षदीक्षा में अर्थात् दीक्षा प्राप्त करनेवाले जब आचार्य के समीप उपस्थित न हो ऐसे जीवन्मृत व्यक्ति आचार्य अपने समीप उपस्थित है ऐसा ध्यान करना चाहिए अथवा उसकी प्रतिकृति कुश या गोबर आदि से बनाकर अपने सामने रखना चाहिए। सामने उपस्थित शिष्य को अर्घपात्र में स्थित जलबिन्दु से प्रोक्षण करने के अनन्तर फूलों से पूजित करना चाहिए। उसके बाद सभी अध्वाओं का न्यास उसके शरीर में कर देना चाहिए। इसके बाद इस विषयका विचार होना चाहिए जो व्यक्ति भोग का अभिलाषी है उसकी शुभ वासना का शोधन नहीं करना चाहिए। लेकिन मुमुक्षु शिष्य के शुभ तथा अशुभ दोनों का ही शोधन आवश्यक हैं। निर्बीज दीक्षा २ हो तो १. धन की प्रचुरता रहने पर भी अपने को निर्धन प्रतिपादन करना ही वित्तशाठ्य है। २. मुमुक्षु दो प्रकार हैं—एक निर्बीज और दूसरा सबीज । मूर्ख, वृद्ध जो अनुष्ठान आदि करने में असमर्थ हैं और जो नानाप्रकार व्याधियों से पीड़ित हैं, उन्हें निर्बीज दीक्षा देनी चाहिए। समयाचार भी एक प्रकार बन्धन है। निर्बीज दीक्षा प्राप्त करने वालों का समयाचार पाशों की शुद्धि आवश्यक है। इन पाशों की शुद्धि हो जाने के कारण उन्हें समयों का पालन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, गुरु और देवताओं के प्रति भक्ति ही उनके लिए समय है। जिनकी मृत्यु निकट है आचार्य अरिष्टलक्षणों से उनकी मृत्यु आसन्न समझकर और उनमें शक्तिपात हुआ ऐसा जानकर उन्हें सद्योनिर्वाण- दायिनी दीक्षा प्रदान करते हैं। आचार्य अपने शिवहस्त आसन्नमृत्यु शिष्य के मस्तक पर अर्पित करते हुए उन्हें परतत्त्व के साथ नियोजित करते हैं।
१५६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १४ समयपाशों का भी शोधन आवश्यक है। निर्बीज दीक्षा उनको दें जिनकी मृत्यु अतिनिकट है और जो अत्यन्त मूर्ख है—यही परमेश्वर की आज्ञा है। गुरु, देवता और अग्नि के प्रति भक्ति से ही उनकी सिद्धि मिलती है। इस विषय में (मन्त्रों के सम्बन्ध में) सभी जगह शिष्यों की वासना के अनुसार मन्त्रोंकी विभिन्नताएँ हैं—क्यों कि वासना के अनुसार ही मन्त्रोंकी कार्यकारिता सिद्ध होती है। अतः शिष्यों की वासना के भेद के अनुसन्धान करने के अनन्तर मुख्य मन्त्र के परामर्श के द्वारा सभी अध्वाएँ जो अपने शरीर में स्थित हैं उन्हें शिवाद्वयभावना से शोधित कर देना चाहिए। इसी क्रम से पैर के अँगुठे से द्वादशान्त तक जो निज शरीर और स्वात्मचैतन्य व्याप्त है उसके साथ शिष्य के देहचैतन्य की अभिन्नता सम्पन्न कर उस चैतन्यस्थिति में जो अनन्त आनन्द का सरोवर और जिसका स्वरूप स्वतन्त्रता रूप ऐश्वर्य है और जो इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति निर्भर सब देवताओं का चक्रेश्वर हैं जो सभी अध्वाओं से परिपूर्ण है इस प्रकार विश्वरूपी भावमण्डल चिन्मात्र ही जिसका अन्तिम स्वरूप है उस स्वरूप के साथ शिष्य की आत्मा के एकीकरण करने के अनन्तर आचार्य को अपने स्वरूप की तदात्मता शिष्य के साथ सम्पन्न कर स्वरूप में विश्रान्ति प्राप्त करना चाहिए। इसी क्रम से शिष्य परमेश्वर से अभिन्न हो जाता है। इसके अनन्तर यदि शिष्य भोगेच्छु है तब जिस तत्त्व में उसकी भोगेच्छा है उसी तत्त्व में उसकी योजना कर देनी चाहिए। तदनन्तर उसके भोग के निर्वाह करने के लिए परमेश्वर के स्वभाव से शीघ्रता से निर्गत होनेवाला शुद्धतत्त्वमय शरीर उसे दे देना चाहिए—यही सभी पाशोंका विश्लेषण करनेवाली दीक्षा है। तब शिष्य को गुरु को दक्षिणा आदि के द्वारा पहले जैसा पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर अग्नि में शिष्यके लिए करणीय विधि का आचरण करना चाहिए। श्रीपरामन्त्र के साथ अमुक के अमुक तत्त्व शोधन करता हूँ। स्वाहा तक मन्त्र का उच्चारण कर प्रति तत्त्व के लिए तीन-तीन आहुतियाँ देनी चाहिए। अन्तिम आहुति वौषड्-अन्त मन्त्र से होना चाहिए। इस प्रकार शिवतक तत्त्व की शुद्धि होती है। उसके बाद जहाँ योजना होती है वहाँ योजना समाप्तकर पूर्णाहुति कर देनी चाहिए।
आ. १४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १५७ भोगेच्छु के लिए भोगभूमि में योजना करने के लिए एक आहुति और शुद्धतत्त्व की सृष्टि के लिए अन्य आहुति आवश्यक है । इसके बाद दक्षिणा आदि के द्वारा गुरु का पूजन करना है । यह हुई पुत्रक दीक्षा । इस दीक्षा में वर्तमान कर्म को छोड़कर भूत और भविष्य के कर्म का शोधन होता है । अपने स्वरूप को जो समस्त अध्वमय है उसे अपने हृदय में और बाहर भी भिन्नता रहित रूप में अनुसन्धान करने के अनन्तर शिष्य की बुद्धि, प्राण शरीर आदिको प्रबुद्ध आचार्य अपने शरीर, प्राण, बुद्धि के साथ एकीकरण करें । जब शिष्य इस प्रकार एकीकरण के प्रभाव से अकस्मात् ( अविलम्ब ) उस महानन्द और चैतन्यमय स्थितिको प्राप्तकर उसमें विश्रान्त हो जाता है तब वह पशुजीव शिवात्मभाव प्राप्त करता है । इति श्रीअभिनवगुप्त द्वारा रचित तन्त्रसार के पुत्रकदीक्षा प्रकाशन नाम का चतुर्दश अध्याय है ।
अथ पञ्चदशमाह्निकम् यदा पुनरासन्नमरणस्य स्वयं वा बन्धुमुखेन शक्तिपात उपजायते, तदा अस्मै सद्यः समुत्क्रमणदीक्षां कुर्यात् । समस्तमध्वानं शिष्ये न्यस्य तं च क्रमेण शोधयित्वा, भगवतीं कालरात्रीम् मर्मकर्तनीं न्यस्य, तया क्रमात्क्रमं मर्मपाशान् विभिद्य, ब्रह्मारन्ध्रवर्ति शिष्यचैतन्यं कुर्यात् । ततः पूर्वोक्तक्रमेण योजनिकार्थं पूर्णाहुतिं दद्यात्, यथा पूर्णाहुत्यन्ते जीवो निष्क्रान्तः परमशिवाभिन्नो भवति । बुभुक्षोस्तु द्वितीया पूर्णाहुतिः— भोगस्थाने योजनाय, तत्काले च तस्य जीवलयः, नात्र शेषवर्तनम्, ब्रह्मविद्यां वा कर्णे पठेत्, सा हि परामर्शस्वभावा सद्यः प्रबुद्धपशुचैतन्ये प्रबुद्धविमर्शं करोति । समयादेरपि च एतत्पाठेऽधिकारः । सप्रत्ययां निर्बीजां तु यदि दीक्षां मूढाय आयातशक्तिपाताय च दर्शयेत्, तदा हि शिवहस्तदानकाले अयं विधिः—त्रिकोणमाग्नेयं ज्वालाकरालं रेफ- विस्फुलिङ्गं बहिर्व्याप्ताच्चक्रधमायमानं मण्डलं दक्षिणहस्ते चिन्तयित्वा तत्रैव हस्ते बीजं किंचित् निक्षिप्य ऊर्ध्वाधोरेफविबोधितफट्कार- परम्पराभिः यस्य तां जननशक्तिं दहेत्, एवं कुर्वन् तं हस्तं शिष्यस्य मूर्धनि क्षिपेत्, इति द्वयोरपि एषा दीक्षा निर्बीजा स्वकार्यकरणसामर्थ्य- विध्वंसिनी भवति—स्थावरणामपि दीक्ष्यत्वेन उक्तत्वात्, वायुपुरान्तर्ध्व- वस्थितं दोधूयमानं शिष्यं लघुभूतं चिन्तयेत्—येन तुलया लघुः दृश्यते इति । मर्मकर्तनविधौ लघुभावे बीजभावविलये यदि मन्त्रः । तत्तथोचितपथेन नियुक्तस्तत्तदाशु कुरुते परमेशः । जं अनु अन्धि विसेसं घेत्तूण जडन्ति मन्तमुच्चरइ । इच्छासत्तिप्पाणो तं तं मन्तो करेइ फुडम् ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे सप्रत्ययदीक्षा- प्रकाशनं नाम पञ्चदशमाह्निकम् ॥१५॥
पञ्चदश आह्निक जब किसी व्यक्ति में जिसकी मृत्यु अति निकट हो गयी है उसमें स्वयं या मित्रों के मुख से जानकर कि उसमें शक्तिपात उत्पन्न हुआ है तब उस व्यक्तिको सद्य समुत्क्रमणी दीक्षा देनी चाहिए।१ सभी अध्वाओं को शिष्य के शरीर में न्यास करने के बाद उन अध्वाओं का शोधन करना आवश्यक है। इसके अनन्तर भगवती कालरात्रि जो मर्म की छेदन करने- वाली है उसका भी न्यास करना चाहिए। उस कालरात्रि के द्वारा क्रम से विभिन्न मर्मंका छेदन करना चाहिए। इसके अनन्तर शिष्य के चैतन्य को ब्रह्मरन्ध्र में स्थापित करना चाहिए।२ इसके अनन्तर चैतन्य का योजन परतत्त्व के साथ होना चाहिए। इस योजना के लिए पहले बतलाये गये क्रम के अनुसार पूर्णाहुति देनी चाहिए। इस पूर्णाहुति के अनन्तर जीवचैतन्य शरीर से निकलकर परमशिव से अभिन्न हो जाता है।३ जो १. शिष्य जो जरा और रोगों से पीड़ित है और जिसमें मलों का परिपाक उत्तमरूप से हुआ है ऐसे शिष्यको मृत्यु सन्निकट जानकर आचार्य सद्य- निर्वाणदायिनी दीक्षा प्रदान करते हैं। २. मर्म के छेदन करने के लिए क्षुरिका का न्यास होना चाहिए । आचार्य आग्नेयी धारणा के द्वारा सभी भस्म स्थानों को उत्तप्त करते हैं और वायु के द्वारा अंगुठे से मस्तक तक सम्पूर्ण शरीर भर गया है इस प्रकार भावना करते हैं। इसके बाद शिष्य के चैतन्य को अंगुठे से भिन्न-भिन्न स्थानों से उठाकर और साथ ही कालरात्रि नाम के क्षुरिका से मर्म से चैतन्य का जो ग्रन्थिरूपी बन्धन है उन्हें काटकर उस चैतन्य को ब्रह्मरंध्र पर स्थापित कर देते हैं । ३. यहाँ जिस क्रम का उल्लेख हुआ है उससे भिन्न षट् चक्र, सोलह आधार, तीन लक्ष्य, पाँच शून्य आदि के भेदन के द्वारा भी आचार्य शिष्य चैतन्य को परमशिव में नियोजित कर सकते हैं । अथवा अन्य विधि जिसे ज्ञान- त्रिशूल-विधि के रूप में वर्णित की जाती है उससे भी उत्क्रामणी दीक्षा दी जाती है । लेकिन प्राणचार के सम्बन्ध में जिनका अभ्यास नही है वे अन्य प्रक्रिया से इस प्रकार दीक्षा प्रदान करते हैं। क्योंकि प्राणचार का सम्यक्, ज्ञान न होने पर ब्रह्मविद्या के पढ़ने से भी उत्क्रामणी दीक्षा सम्पन्न होती है।
१६० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १५ शिष्य भोग का अभिलाषी है भोग के स्थान में उसकी योजना के लिए दूसरी पूर्णाहुति की आवश्यकता है। इस दीक्षा के अनन्तर उसी जीव चैतन्य का लय हो जाता है। उसके लिए और कुछ कर्म शेष नहीं रहता। अथवा उसके कान में ब्रह्मविद्या पढ़ना चाहिए। १ क्योंकि यह ब्रह्मविद्या स्वतः ही परमार्थ परामर्शन स्वभावात्मक है और इसी कारण से प्रबुद्ध पशु के चैतन्य में यह उसी क्षण प्रबुद्ध विमर्श उत्पन्न करती है। जो लोग समयी हैं उनको भी इस विद्या के पाठ में अधिकार है। जो सप्रत्यय निर्बीज दीक्षा प्राप्त करते हैं वे मूर्ख होने पर भी शक्तिपात प्राप्त होनेके कारण उसे यह दिखाना चाहिए। जब उसके मस्तक पर शिवहस्त प्रदान किया जाता है उसी समय यह विधि का प्रयोग होता है। ऊर्ध्वमुख त्रिकोण में जो अग्नि की ज्वाला से भयंकर है, अग्निवाचक वर्ण र जो अग्नि के स्फुलिंग के समान उज्ज्वल है और जो षडश्र वायु चक्र के द्वारा निरन्तर ध्यायमान हो रहा है अपने दाहिने हाथ में इस प्रकार मण्डल के चिन्तन के अनन्तर उस हाथ में धान्यादि बीज को छोड़कर उसके ऊपर और नीचे रेफ वर्ण के द्वारा जाग्रत किया गया मन्त्र की परम्परा से उस बीज की जननशक्ति को नष्ट कर देना चाहिए२ हाथ में इस प्रकार चिन्तन के अनन्तर उस हाथ को शिष्य के मस्तक के ऊपर स्थापित करना चाहिए। ऐसे करने से ( बीज और शिष्य ) दोनों की निर्बीज दीक्षा होती है। जिससे उसमें अपने कार्य करने की जो शक्ति थी उसका नाश हो जाता है। स्थावरों की दीक्षा का उल्लेख शास्त्रकारों ने किया है। वायुपुर में स्थित और वायु से शिष्य ढोया जा १. तन्त्रालोक में इस ब्रह्मविद्या का उल्लेख किया गया है। यह पंचाक्षरमय मन्त्र है। २. मन्त्र में असीम शक्ति निहित है लेकिन इस विषय में बहुतों को शंका और संशय वर्तमान है। इस संशय के दूरीकरण के लिए आचार्य अपने दाहिने हाथ में एक मण्डल का चिन्तन करते हैं और उसी मण्डल में एक धान को रखकर कुछ मन्त्र का पाठ करते रहते हैं। मन्त्र के पाठ से उस धान का अंकुर पैदा करने की शक्ति नष्ट हो जाती है। यही हुआ निर्बीजकरण। इसके अनन्तर उस हाथ को शिष्य के मस्तक पर रखा जाता है।
आ. १५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६१ रहा है इस प्रकार चिन्तन करना चाहिए ! इस प्रकार चिन्तन करने के पहले तराजू में शिष्य की लघुता दिखलायी पड़ती है१ । मर्म के छेदन से शिष्य की लघुता और बीजभाव के विलयन में मन्त्र जब सामर्थ्य रखता है तब उसे उचित मार्ग की ओर परमेश्वर शीघ्र नियुक्त करते हैं । इति श्रीअभिनवगुप्तपाद द्वारा रचित तन्त्रसार का पन्द्रह आह्निक १. शिष्य में सद्य प्रत्यय ( विश्वास ) उत्पन्न करने के लिए तुला दीक्षा का विधान है । इस प्रकार दीक्षा प्राप्त करने के बाद शिष्य का शरीर अत्यन्त लघु हो जाता है क्यों कि इस दीक्षा द्वारा उस शरीर में पार्थिव शक्ति स्तम्भित हो जाती है और उसका शरीर वायु में उठ जाता है । तराजू में वजन करने पर उसका शरीर की लघुता दिखलाई देती है । धर्मशास्त्रों के तुलाशुद्धि प्रकरण में इस विषय की चर्चा हुई है । ११
अथ षोडशमाह्निकम् अथ परोक्षस्य दीक्षा, द्विविधश्च सः—मृतो जीवंश्च । तत्र कृतगुरुसेव एव मृत उद्वासितो वा अभिचारादिहतो डिम्बाहतो मृत्युक्षणोदितत- थारुचिः मुखान्तरायातशक्तिपातो वा तथा दीक्ष्य इत्याज्ञा । अत्र च मृतदीक्षायाम् अधिवासादि न उपयुज्यते । मण्डले मन्त्रविशेषसंनिधये यत्र बहुला क्रिया, उत्तममुपकरणं पुष्पादि, स्थानं पीठादि, मण्डलं त्रिशूलाब्जादि, आकृतिः ध्येयविशेषः, मन्त्रः स्वयं दीप्रश्च, ध्यानपरस्य योगिनः तदेकभक्तिसमावेशशालिनो ज्ञानिनश्च संबन्धः, इत्येते संनिधान- हेतवो यथोत्तरम् उक्ताः । समुदितत्वे तु का कथा स्यात्—इति परमेश्वरेण उक्तम् । ततो देवं पूजयित्वा तदाकृतिं कुशादिमयीम् अग्रे स्थापयित्वा गुर्वासादितज्ञानोपदेशक्रमेण तां पश्येत्, स च मूलधारादुदेत्य प्रसृतसुविततानन्तनाड्यध्वदण्डं वीर्येणाक्रम्य नासागगनपरिगतं विक्षिपन्व्योमृषीष्टे । यावद्धूमाभिराम्प्रचिततरशिखाजालकेनाध्वचक्रं संच्छाद्याभीष्टजीवानयनमिति महाजालनामा प्रयोगः ॥ एतेनाच्छादनीयं व्रजति परवशं संमुखीनत्वमादौ पश्चादानीयते चेत्सकलमथ ततोऽप्यध्वमध्याद्यथेष्टम् । आकृष्ट्यावुद्धृतौ वा मृतजनविषये कर्शणीयेऽथ जीवे योगः श्रीशंभुनाथागमपरिगमितो जालनामा मयोक्तः ॥ बहिरपि इत्थं कथं न भवति, आकर्षणादौ विनाभ्यासात् ? इति चेत्— रागद्वेषादियोगवशेन तत्प्रवृत्तौ ऐश्वर्यविशायोगात् । ततो नियति निय- न्त्रितत्वात् अभ्यासाद्यपेक्षा स्यादेव । इह तु अनुग्रहात्मकपरमेश्वरातावे- शात् तथाभावः । परमेश्वर एव हि गुरुशरीराधिष्ठानद्वारेण अनुग्राह्यान् अनुगृह्णाति स च अचिन्त्यमहिमा इति उक्तप्रायम् । एवं जालप्रयोगा- कृष्टो जीवो दार्भं जातीफलादि वा शरीरं समाविष्टो भवति, न च
आ. १६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६३ स्पन्दते—मनःप्राणादिसामग्र्यभावात्, तदनुध्यानबलात् तु स्पन्दतेऽपि तादृशेऽपि तस्मिन् पूर्ववत् प्रोक्षणादिसंस्कारः पूर्णाहुतियोजनिकान्तः। अत्र परं पूर्णाहुत्या तस्य दार्भाद्याकारस्य परतेजसि लयः कर्तव्यः। एवम् उद्धृतोऽसौ पूर्णाहुत्यैव अपवृज्यते—यदि स्वर्नरकप्रेततिर्यक्षु स्थितः। मनुष्यस्तु तदैव ज्ञानं योगं दीक्षां विवेकं वा लभते—अधिकारिशरीर- त्वात्, इति मृतोद्धरणम्। जीवतोऽपि परोक्षस्य उत्पन्ने शक्तिपातेऽयमेव क्रमः, दार्भाकृतिकल्पनजीवाकृष्टिवर्जम्। ध्यानमात्रोपस्थापितस्यैव अस्य संस्कारः दीक्षा च भोगमोक्षोभयदायिनी—स्ववासनाबलीयस्त्वात्, भोगवासनाविच्छेदस्य च असंभाव्यमानत्वात् बहुभिः, दीक्षायाम् ऊर्ध्व- शासनसंस्कारो बलवान् अन्यस्तु तत्संस्काराय स्यात्। परोक्षस्यापि दीक्षितस्य तदैव ज्ञानाद्याविर्भावः इति। परमेश्वरतावेशदाढर्यात्स्वातन्त्र्यभाग्गुरुः । परोक्षमभिसंधाय दीक्षितेति किमद्भुतम् ॥ परम्म सिवतम्म अत्तण- प्पडिअंसच्छन्दभान । परमत्थं जो आविसत्ताऽस- दिक्खइ परोक्ख इवं पिसिस्सगणं ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे परोक्षदीक्षाप्रकाशनं नाम षोडशमाह्निकम् ॥ १६ ॥
षोडश आह्निक परोक्ष व्यक्ति की दीक्षा की विधि बतलायी जाती है। १ परोक्ष व्यक्ति दो प्रकार हैं एक है मृत और दूसरा जीवित है। उन में जिसने गुरु की सेवा की है और दीक्षा पाने के पहले मर गया है अथवा दूसरी जगह चला गया है, या अभिचार के प्रयोग से मारा गया है या डिम्ब से मारा गया है २ और मृत्यु के समय दीक्षा की इच्छा उठती है अथवा दूसरों के मुख से अर्थात् बन्धु, भार्या सुहृत् या पुत्र के मुख से यह जानकर की उसमें शक्तिपात हुआ है तो उस समय गुरु उसे दीक्षा दें यही परमेश्वर की आज्ञा है। मृतजनों को दीक्षा देते समय अधिवास आदि करने की उपयोगिता नहीं है। पूजा के मण्डल में विशेष प्रकार मन्त्र- के सन्निधान के लिए जहाँ बहुविध क्रिया की आवश्यकता है जैसे उत्तम (लक्षण से समन्वित) पुष्प आदि, स्थान जैसे पीठादि, मण्डल जैसे त्रिशूल और कमल, विशेषध्येयरूपी आकृति, स्वतः दीप्त मन्त्र, ध्यान परायण परमेश्वर के प्रति अनन्य भक्ति से समाविष्ट ज्ञानी पुरुषों के साथ इन सबका सम्बन्ध है। ३ ये सब मंत्रके सन्निधान के कारण एक के बाद बाद एक हो तो ठीक है, इन में सब एक साथ हो तो उत्तम है ऐसा ही परमेश्वर ने कहा है। इसके अनन्तर परमेश्वर के पूजन के बाद शिष्य जो मृत या दूर देश में है उसकी कुश से बनी मूर्ति को १. रुद्रशक्ति के समावेश होने पर ही किसी पुरुष में गुरु के समीप जाने की इच्छा होती है, क्यों कि भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली दीक्षा तभी सम्भव होती है। लेकिन दीक्षा प्राप्त करने के पहले अगर दीक्षा प्राप्त करने- वाले की मृत्यु हो जाती है तो गुरु के समीप जाना कैसे सम्भव होता है ? इस प्रश्न का समाधान यह है कि गुरु की कृपापात्रता बनना ही सन्निधान का तात्पर्य है गुरु के समीप जाना या जाना यहाँ अवास्तव है। २. वाहनों के द्वारा आकस्मिक मृत्यु होने पर । ३. क्रिया, उपकरण, स्थान, मण्डल, आकृति, मन्त्र, ध्यान, योग, ईश्वर में अनन्य भक्ति, ज्ञान और तन्मयभाव ये ग्यारह मन्त्र के सन्निधान के कारण बतलाये जाते हैं लेकिन ईश्वर में अनन्य भक्ति इन में मुख्य है।
आ. १६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६५ सम्मुख रखकर गुरु अपने आचार्य से प्राप्त ज्ञान के उपदेश जिस क्रम से पाये हैं उस ज्ञान दृष्टि से उसे देखें।१ वह तो :— मूलाधार से उदित और वहाँ से प्रसृत सुविस्तृत अनन्त नाड़ियों में प्रवहमान प्राण ने दण्ड का आकार धारण कर लिया है। उस प्राण को शाक्तबल से अपने अधिकार में लाकर और हृदय आदि स्थानों को पार करा कर एवम् नासिकारन्ध्र तक उसे पहुँचाकर बाहर निक्षेप कर देना चाहिए ताकि वह प्राण विश्वव्यापक बन जाय। इसके अनन्तर उस प्राण रूप अग्नि से निकले प्रचुर धूम के जाल से समग्र अध्वाओं को आच्छादित कर देना चाहिए। यही ईप्सित जीव के आनयनरूप महाजाल नाम का प्रयोग है।२ इस जालप्रयोग से जो आच्छादनीय अध्वसमूह है वह दूसरे का अधीन बन जाता है। उसे पहले अपने सम्मुख उपस्थित किया जाता १. कुश या गोमय से शिष्य की आकृति बनानी चाहिए। उसी आकृति में ही शिष्य वर्तमान है इस प्रकार भावना करते हुए उसे गुरु अपने सम्मुख स्थापित कर देते हैं। उस आकृति में प्रकृति तक अध्वा का न्यास करना चाहिए क्यों कि मृत पुरुष प्रकृति में ही स्थित रहता है। इसके अनन्तर महान् जाल प्रयोग से उस पुरुष के चित्तको आकर्षित करा उस पुरुषको अपने सम्मुख स्थित कुश में स्थापित करना चाहिए। २. महाजाल प्रयोग मृतव्यक्तियों के लिए किया जाता है। इसका विशेष वर्णन तन्त्रालोक में मिलता है जिसका सार नीचे लिखा जा रहा है। आचार्य स्वभावतः ही शिवाहं भावना में परिनिष्ठित रहते हैं। वे महाजाल प्रयोग के पहले पुनः पुनः रेचक, पूरक और कुम्भक के द्वारा मूला- धार से प्राणशक्ति को जाग्रत करते हैं। इस जागरण का विशेष तात्पर्य है। प्राण अपने स्वभाव से समग्र शरीर में व्याप्त रहता है। शरीर में साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ हैं जिनमें प्राण विचरता रहता है। कुम्भक के प्रयोग से प्राण दण्ड का आकार धारण कर लेता है। तब आचार्य उसे विभिन्न स्थानों को पार कराकर नासिकारन्ध्र तक ले जाते हैं और बाहर छोड़ देते हैं। बाहर छोड़ा गया प्राण ही धूम के समान सारे विश्व में फैल जाता है और अन्त में वह एक विशाल जाल के समान बन जाता है। मछुए के जाल से जैसे मछली पकड़ी जाती है, उसी प्रकार मृत आत्मा जहाँ कहीं भी हो उस जाल से निकट लाया जाता है।
१६६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १६ है, यद्यपि सभी को लाया जाता है और बाद में उसी का ग्रहण होता है । अध्वासमूह में केवल उस अभीष्ट जीव को आकृष्ट करने के बाद उसका ( शिष्य का ) ही उद्धार किया जाता मृतजनों के विषय में यह जालप्रयोग और दीक्षा रूपी योग श्री शम्भुनाथ के वचन से मुझे ज्ञात हुआ और मैंने उसे कह दिया । बाहर भी इस प्रकार क्यों नहीं होता है ? आकर्षण आदि कार्यों में बिना अभ्यास से काम नहीं बनता । राग और द्वेष से कार्य में प्रवृत्त होने पर ईश्वरीय शक्ति का आवेश जो आचार्य में वर्तमान है उसकी हानि हो जाती है, क्यों कि वह नियतिनियन्त्रित है और अभ्यास की अपेक्षा भी है, लेकिन इस जगह अनुग्रहात्मक परमेश्वरता का आवेश आचार्य में ( दीक्षा के समय ) रहता है, इसलिए अभ्यास की अपेक्षा यहाँ नहीं है । परमेश्वर ही गुरु के शरीर में अधिष्ठित होकर जो अनुग्रह पाने वाले हैं उन्हें अनुग्रह करते हैं। उनकी महिमा अचिन्तनीय है यह कहा ही गया है ! इस जालप्रयोग से जीव आकृष्ट होने पर कुश या जातीफल आदि शरीर में समाविष्ट होता है । उस समय उस में स्पन्दन नहीं होता है क्यों कि जीव के मन, प्राण आदि सामग्री वहाँ उपस्थित नहीं रहती, लेकिन उनका ( मन और प्राणों का ) ध्यान होने पर वह स्पन्दित भी होता है । जिस प्रकार हो उस में ( कुश आदि शरीर में ) पहले जैसे प्रोक्षण आदि संस्कार करने के बाद पूर्णाहुति और शिवत्वयोजन तक कार्य करना चाहिए । इसके बाद पूर्णाहुति के द्वारा उस कुशमय शरीर को परम प्रकाश में विलयन करना चाहिए । इस प्रकार शिष्य के उद्धार होने पर पूर्णाहुति के साथ ही उसकी मुक्ति हो जाती है अगर वह स्वर्ग, इस जाल प्रयोग में और भी बातें हैं। इस प्रयोग में मन्त्र का भी उपयोग है । मायाबीज को संहार क्रम से उच्चरित किया जाता है, यह दण्डाकार ‘र’ है, इसके साथ शाक्तस्पन्दमय हकार और अन्त में नासारन्ध्र में ईकार जो ज्योतिरूप धारण कर लेता है । उस ईकार स्थित बिन्दु उसकी शिखा बन जाता है । यही शिखा ही व्यापक विश्वमय जाल का रूप धारण लेती है। यह जाल लिङ्ग शरीर धारण किये हुए स्रोत में तैरता हुआ जीव को उठाता है । आचार्य उस जीव को स्वर्ग, नरक या किसी भी स्थिति से उद्धार करते हैं ।
आ. १६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६७ नरक, प्रेत या तिर्यक्स्थिति में क्यों न हो । मनुष्य शरीर में अगर वह स्थित हो तो उसी समय ज्ञान, योग, दीक्षा या विवेक प्राप्त होता है—क्यों कि उसका अधिकारी शरीर है ।¹ यह हुआ मृत पुरुषों का उद्धरण । जो जीवित और परोक्ष में स्थित है अगर उसमें शक्तिपात हुआ है तो उसके उद्धार का यही क्रम है, केवल कुशमय शरीर की कल्पना और जीवाकर्षण को छोड़कर केवल ध्यान से ही उसकी उपस्थिति के बाद उसका संस्कार होता है । दीक्षा भोग तथा मोक्ष उभय के देनेवाली है क्योंकि अपनी अपनी वासना अत्यन्त बलवान है और बहुतों की भोगवासना दूर करना एक- प्रकार असम्भव है । दीक्षा में ऊर्ध्वशासन से प्राप्त संस्कार ही बलवान है, जो निम्नकोटि के शास्त्रों से संस्कृत है उन्हें पुनः संस्कार की अपेक्षा है । जो परोक्ष रूप से दीक्षित है उसमें ज्ञान का आविर्भाव होता है । यह बड़ा ही आश्चर्य है कि परमेश्वरता के आवेश की दृढ़ता से स्वतन्त्रता प्राप्त गुरु परोक्ष में स्थित जीवों को चिन्तन के द्वारा दीक्षा देते हैं । इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य रचित तंत्रसार के परोक्षदीक्षा प्रकरण का सोलह आह्निक है । १. जिस मृत जीव ने मनुष्य शरीर प्राप्त कर लिया है परोक्षदीक्षा से उसकी मुक्ति अविलम्ब नहीं होती है, उस शरीर के छूटने पर होती है । अगर गुरु चाहे तो परोक्षदीक्षा के साथ साथ उसकी मृत्यु भी हो सकती है ।
अथ सप्तदशमाह्निकम् अथ लिङ्गोद्धारः वैष्णवादिदक्षिणतन्त्रान्तेषु शासनेषु ये स्थिताः तद्गृहीतव्रता वा, ये च उत्तमशासनस्था अपि अनधिकृताधरशासनगुरूपसेविनः, ते यदा शक्तिपातेन पारमेश्वरेण उन्मुखीक्रियन्ते तदा तेषामयं विधिः,—तत्र एनं कृतोपवासम् अन्यदिने साधारणमन्त्रपूजितस्य तदीयां चेष्टां श्रावि- तस्य भगवतोऽग्रे प्रवेशयेत्, तत्रास्य व्रतं गृहीत्वा अम्भसि क्षिपेत्, ततोऽसौ स्नायात्, ततः प्रोक्ष्य, चरुदन्तकाष्ठाभ्यां संस्कृत्य, बद्धनेत्रं प्रवेश्य साधा- रणेन मन्त्रेण परमेश्वरपूजां कारयेत्। ततः साधारणमन्त्रेण शिवीकृते अग्नौ व्रतशुद्धिं कुर्यात्, तन्मन्त्रसंपुटं नाम कृत्वा 'प्रायश्चित्तं शोधयामि' इति स्वाहान्तं शतं जुहुयात्। ततोऽपि पूर्णाहुतिः वौषडन्तेन। ततो व्रतेश्वरम् आहूय पूजयित्वा तस्य शिवाज्ञया 'अकिञ्चित्करः त्वमस्य भव' इति श्रावणां कृत्वा तं तर्पयित्वा विसृज्य अग्निं विसृजेत्, इति लिङ्गो- द्धारः। ततोऽस्य अधिवासादि प्राग्वत्। दीक्षा यथेच्छम्। अधरस्थोऽपि गाढेशशक्तिप्रेरितमानसः । संस्कृतस्य दीक्ष्यो यश्च प्राङ्गिरतोऽसद्गुरावभूत् ॥ पसवअणुहं जोत्तमसासणुल इविणुवणु परमेसपसाइण । पत्थइ सद्गुरुबोहपसाहणु सो दिक्खइ लिङ्गोद्धारिण ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचिते श्रीतन्त्रसारे लिङ्गोद्धरणं नाम सप्तदशमाह्निकम् ॥ १७ ॥