भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

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आ. १५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६१ रहा है इस प्रकार चिन्तन करना चाहिए ! इस प्रकार चिन्तन करने के पहले तराजू में शिष्य की लघुता दिखलायी पड़ती है१ । मर्म के छेदन से शिष्य की लघुता और बीजभाव के विलयन में मन्त्र जब सामर्थ्य रखता है तब उसे उचित मार्ग की ओर परमेश्वर शीघ्र नियुक्त करते हैं । इति श्रीअभिनवगुप्तपाद द्वारा रचित तन्त्रसार का पन्द्रह आह्निक १. शिष्य में सद्य प्रत्यय ( विश्वास ) उत्पन्न करने के लिए तुला दीक्षा का विधान है । इस प्रकार दीक्षा प्राप्त करने के बाद शिष्य का शरीर अत्यन्त लघु हो जाता है क्यों कि इस दीक्षा द्वारा उस शरीर में पार्थिव शक्ति स्तम्भित हो जाती है और उसका शरीर वायु में उठ जाता है । तराजू में वजन करने पर उसका शरीर की लघुता दिखलाई देती है । धर्मशास्त्रों के तुलाशुद्धि प्रकरण में इस विषय की चर्चा हुई है । ११