तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदश आह्निक जब किसी व्यक्ति में जिसकी मृत्यु अति निकट हो गयी है उसमें स्वयं या मित्रों के मुख से जानकर कि उसमें शक्तिपात उत्पन्न हुआ है तब उस व्यक्तिको सद्य समुत्क्रमणी दीक्षा देनी चाहिए।१ सभी अध्वाओं को शिष्य के शरीर में न्यास करने के बाद उन अध्वाओं का शोधन करना आवश्यक है। इसके अनन्तर भगवती कालरात्रि जो मर्म की छेदन करने- वाली है उसका भी न्यास करना चाहिए। उस कालरात्रि के द्वारा क्रम से विभिन्न मर्मंका छेदन करना चाहिए। इसके अनन्तर शिष्य के चैतन्य को ब्रह्मरन्ध्र में स्थापित करना चाहिए।२ इसके अनन्तर चैतन्य का योजन परतत्त्व के साथ होना चाहिए। इस योजना के लिए पहले बतलाये गये क्रम के अनुसार पूर्णाहुति देनी चाहिए। इस पूर्णाहुति के अनन्तर जीवचैतन्य शरीर से निकलकर परमशिव से अभिन्न हो जाता है।३ जो १. शिष्य जो जरा और रोगों से पीड़ित है और जिसमें मलों का परिपाक उत्तमरूप से हुआ है ऐसे शिष्यको मृत्यु सन्निकट जानकर आचार्य सद्य- निर्वाणदायिनी दीक्षा प्रदान करते हैं। २. मर्म के छेदन करने के लिए क्षुरिका का न्यास होना चाहिए । आचार्य आग्नेयी धारणा के द्वारा सभी भस्म स्थानों को उत्तप्त करते हैं और वायु के द्वारा अंगुठे से मस्तक तक सम्पूर्ण शरीर भर गया है इस प्रकार भावना करते हैं। इसके बाद शिष्य के चैतन्य को अंगुठे से भिन्न-भिन्न स्थानों से उठाकर और साथ ही कालरात्रि नाम के क्षुरिका से मर्म से चैतन्य का जो ग्रन्थिरूपी बन्धन है उन्हें काटकर उस चैतन्य को ब्रह्मरंध्र पर स्थापित कर देते हैं । ३. यहाँ जिस क्रम का उल्लेख हुआ है उससे भिन्न षट् चक्र, सोलह आधार, तीन लक्ष्य, पाँच शून्य आदि के भेदन के द्वारा भी आचार्य शिष्य चैतन्य को परमशिव में नियोजित कर सकते हैं । अथवा अन्य विधि जिसे ज्ञान- त्रिशूल-विधि के रूप में वर्णित की जाती है उससे भी उत्क्रामणी दीक्षा दी जाती है । लेकिन प्राणचार के सम्बन्ध में जिनका अभ्यास नही है वे अन्य प्रक्रिया से इस प्रकार दीक्षा प्रदान करते हैं। क्योंकि प्राणचार का सम्यक्, ज्ञान न होने पर ब्रह्मविद्या के पढ़ने से भी उत्क्रामणी दीक्षा सम्पन्न होती है।