भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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१५६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १४ समयपाशों का भी शोधन आवश्यक है। निर्बीज दीक्षा उनको दें जिनकी मृत्यु अतिनिकट है और जो अत्यन्त मूर्ख है—यही परमेश्वर की आज्ञा है। गुरु, देवता और अग्नि के प्रति भक्ति से ही उनकी सिद्धि मिलती है। इस विषय में (मन्त्रों के सम्बन्ध में) सभी जगह शिष्यों की वासना के अनुसार मन्त्रोंकी विभिन्नताएँ हैं—क्यों कि वासना के अनुसार ही मन्त्रोंकी कार्यकारिता सिद्ध होती है। अतः शिष्यों की वासना के भेद के अनुसन्धान करने के अनन्तर मुख्य मन्त्र के परामर्श के द्वारा सभी अध्वाएँ जो अपने शरीर में स्थित हैं उन्हें शिवाद्वयभावना से शोधित कर देना चाहिए। इसी क्रम से पैर के अँगुठे से द्वादशान्त तक जो निज शरीर और स्वात्मचैतन्य व्याप्त है उसके साथ शिष्य के देहचैतन्य की अभिन्नता सम्पन्न कर उस चैतन्यस्थिति में जो अनन्त आनन्द का सरोवर और जिसका स्वरूप स्वतन्त्रता रूप ऐश्वर्य है और जो इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति निर्भर सब देवताओं का चक्रेश्वर हैं जो सभी अध्वाओं से परिपूर्ण है इस प्रकार विश्वरूपी भावमण्डल चिन्मात्र ही जिसका अन्तिम स्वरूप है उस स्वरूप के साथ शिष्य की आत्मा के एकीकरण करने के अनन्तर आचार्य को अपने स्वरूप की तदात्मता शिष्य के साथ सम्पन्न कर स्वरूप में विश्रान्ति प्राप्त करना चाहिए। इसी क्रम से शिष्य परमेश्वर से अभिन्न हो जाता है। इसके अनन्तर यदि शिष्य भोगेच्छु है तब जिस तत्त्व में उसकी भोगेच्छा है उसी तत्त्व में उसकी योजना कर देनी चाहिए। तदनन्तर उसके भोग के निर्वाह करने के लिए परमेश्वर के स्वभाव से शीघ्रता से निर्गत होनेवाला शुद्धतत्त्वमय शरीर उसे दे देना चाहिए—यही सभी पाशोंका विश्लेषण करनेवाली दीक्षा है। तब शिष्य को गुरु को दक्षिणा आदि के द्वारा पहले जैसा पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर अग्नि में शिष्यके लिए करणीय विधि का आचरण करना चाहिए। श्रीपरामन्त्र के साथ अमुक के अमुक तत्त्व शोधन करता हूँ। स्वाहा तक मन्त्र का उच्चारण कर प्रति तत्त्व के लिए तीन-तीन आहुतियाँ देनी चाहिए। अन्तिम आहुति वौषड्-अन्त मन्त्र से होना चाहिए। इस प्रकार शिवतक तत्त्व की शुद्धि होती है। उसके बाद जहाँ योजना होती है वहाँ योजना समाप्तकर पूर्णाहुति कर देनी चाहिए।