भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

आ. १४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १५५ यागस्थान की रचना करनी चाहिए, इस विषय में वित्तशाठ्य १ न होना चाहिए। धन की कमी हो तो महामण्डलयाग नहीं करना चाहिए। जीवित पशुओं को निवेदित करना चाहिए। इसी उपाय से उन पर अनुग्रह होता है अतः उन पर करुणाभाव दिखलाकर शास्त्रविधि पर सन्देह न करना चाहिए। इसके बाद अग्नि में परमेश्वर को तिल और घृत से तर्पण कर उस अग्नि में दूसरे पशु को वपा होम के लिए रखना चाहिए। फिर मण्डल का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर परमेश्वर से विज्ञापित कर सब से अभिन्न षडर्ध परिपूर्ण अपने स्वरूप को चिन्तन करते हुए शिष्य को अपने सम्मुख स्थापित करना चाहिए। परोक्षदीक्षा में अर्थात् दीक्षा प्राप्त करनेवाले जब आचार्य के समीप उपस्थित न हो ऐसे जीवन्मृत व्यक्ति आचार्य अपने समीप उपस्थित है ऐसा ध्यान करना चाहिए अथवा उसकी प्रतिकृति कुश या गोबर आदि से बनाकर अपने सामने रखना चाहिए। सामने उपस्थित शिष्य को अर्घपात्र में स्थित जलबिन्दु से प्रोक्षण करने के अनन्तर फूलों से पूजित करना चाहिए। उसके बाद सभी अध्वाओं का न्यास उसके शरीर में कर देना चाहिए। इसके बाद इस विषयका विचार होना चाहिए जो व्यक्ति भोग का अभिलाषी है उसकी शुभ वासना का शोधन नहीं करना चाहिए। लेकिन मुमुक्षु शिष्य के शुभ तथा अशुभ दोनों का ही शोधन आवश्यक हैं। निर्बीज दीक्षा २ हो तो १. धन की प्रचुरता रहने पर भी अपने को निर्धन प्रतिपादन करना ही वित्तशाठ्य है। २. मुमुक्षु दो प्रकार हैं—एक निर्बीज और दूसरा सबीज । मूर्ख, वृद्ध जो अनुष्ठान आदि करने में असमर्थ हैं और जो नानाप्रकार व्याधियों से पीड़ित हैं, उन्हें निर्बीज दीक्षा देनी चाहिए। समयाचार भी एक प्रकार बन्धन है। निर्बीज दीक्षा प्राप्त करने वालों का समयाचार पाशों की शुद्धि आवश्यक है। इन पाशों की शुद्धि हो जाने के कारण उन्हें समयों का पालन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, गुरु और देवताओं के प्रति भक्ति ही उनके लिए समय है। जिनकी मृत्यु निकट है आचार्य अरिष्टलक्षणों से उनकी मृत्यु आसन्न समझकर और उनमें शक्तिपात हुआ ऐसा जानकर उन्हें सद्योनिर्वाण- दायिनी दीक्षा प्रदान करते हैं। आचार्य अपने शिवहस्त आसन्नमृत्यु शिष्य के मस्तक पर अर्पित करते हुए उन्हें परतत्त्व के साथ नियोजित करते हैं।