भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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१५४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १४ अराओं के दक्षिण तथा वाम के त्रिशूलों में अन्य दो-दो देवियों का पूजन होना चाहिए। अतः सब स्थानों में भगवती शक्तियों का अधिष्ठान होने के कारण सभी स्थितियाँ पूर्ण हो जाती हैं। इसके बाद मध्यस्थ अरा में सब देवताचक्र, लोकपाल और उनके आयुधों की अभिन्नता बोध को अपनाते हुए पूजन करना चाहिए, उनके अधिष्ठान के कारण एक स्थान के पूजन से सभी स्थानों में पूजन सम्पन्न होता है। उसके उपरान्त कुम्भ, कलश, मण्डल, अग्नि और निज आत्मा की अभेदभावना के द्वारा इन पाँचों अधिकरणों का अनुसन्धान करना चाहिए¹। इसके उपरान्त परमेश्वराद्वय-रस से पुष्ट पुष्प आदि से विशेषपूजा करनी चाहिए। अधिक क्या कहूँ-तर्पण, नैवेद्य आदि उपकरणो से परिपूर्ण त्रिशूलों में जो मध्य में स्थित है उसके दाहिने और बायें में क्रमशः परापरा तथा अपरा शक्तियाँ अधिष्ठित हैं और मध्य में पराशक्ति स्थित है। त्रिशूल जो दाहिने है वह श्री परापरा देवी के द्वारा अधिष्ठित है। उस त्रिशूल के दाहिने तथा बायी अराएँ श्री परा और अपरा देवियों के द्वारा अधिष्ठित हैं। इस विवरण से प्रतीत होता है कि प्रत्येक त्रिशूल के मध्य भाग क्रमशः श्री परा, श्री परापरा और श्री अपरा देवियों के द्वारा अधिष्ठित है, मध्यस्थ त्रिशूल का मध्यभाग श्रीपरा देवी के द्वारा अधिष्ठित है अतः अन्य दो शक्तियाँ उनके अंग है और वह स्वयं अंगी है। यद्यपि त्रिशूलों में देवियाँ स्थित हैं तो भी देवियाँ देवरहित नहीं हैं, उनके भैरव भी उनके साथी हैं जैसे मध्य में भैरवसद्भाव, दक्षिण में रतिशेखर और वामभाग में नवात्मा स्थित हैं। श्री परादेवी पूर्णचन्द्र प्रतिमा हैं अर्थात् श्वेतवर्ण है, श्री परापरा रक्तवर्ण है और वाम में श्री अपरादेवी कृष्णपिंगल वर्ण हैं। १. यद्यपि कुम्भ, कलश आदि एक दूसरे से भिन्न है तो भी मैं ही सभी जगह स्थित हूँ इस प्रकार अद्वयभावना का अनुसन्धान यथायथ होने पर उनके द्वैतरूप समाप्त हो जाता है। इस प्रकार शिवात्मक अद्वयव्याप्ति का अनुसन्धान जिससे होना सम्भव नहीं है वह मध्यनाड़ी के प्रयोग से अद्वयमार्ग में प्रवेश करता है। अर्थात् बहिर्याग न करके मध्यनाड़ी में त्रिशूल की कल्पना कर उसके सहारे अद्वयबोध में स्थित हो सकता है।