भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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१५० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ तीर्थ और क्षेत्र को अधिक सम्मान से नहीं देखना चाहिए। मन्त्र का हृदय जो विमर्शरूप है उसका निरन्तर स्मरण करना चाहिए। इस प्रकार समयों का श्रवण करने के बाद गुरु के समीप जाकर उन्हें प्रणाम करने के अनन्तर धन दार और इतना तक कि शरीर भी दक्षिणा के रूप में देकर उन्हें तुष्ट कर जिन्होंने पहले दीक्षा प्राप्त कर ली हैं उन्हें तथा दीन और अनाथों को तृप्त करना चाहिए। आगे आनेवाली विधि से मूर्तिचक्र का तर्पण करना चाहिए। इस विधि से शिष्य समयी बन जाता है। समयी बन जाने पर मन्त्र के अभ्यास में, नित्य पूजा में, शास्त्र के श्रवण और अध्ययन में अधिकार आता है। नैमित्तिक कार्यों के लिए गुरु से ही प्रार्थना करनी चाहिए। इतना तक सामयिक विधि है। सभी अध्वाओं को अपने स्वरूप में चिन्तन करने के बाद अपने पूर्ण आत्म स्वरूप को अवलोकन करें। उसके बाद द्वादशान्त तक व्याप्त शिष्य के स्वरूप को अनुग्रह रूपी बोध से देखें—उसी से शिष्य समयी १ बन जाता है। श्री अभिनवगुप्त द्वारा रचित तन्त्रसार का समयीदीक्षा प्रकरण नामक त्रयोदश आह्निक है। १. समय शब्द से आगमशास्त्रों में निर्धारित अवश्य पालनीय नियमों को समझना चाहिए। समयदीक्षा प्राप्त होने पर शास्त्रों का अध्ययन, श्रवण, पूजन, जप, ध्यान आदियों में अधिकार प्राप्त होता है। गुरु के द्वारा कथित आचारों का पालन, ध्यान आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है। आगे चलकर समयी पुत्रक दीक्षा प्राप्त कर सकता है। समयी की पाश- शुद्धि अवश्य होती है, पाशों का निर्मूलन नहीं होता, इसलिए पूर्णता की प्राप्ति नहीं होती है। इस दीक्षा के द्वारा परतत्त्व की ओर चलने का मार्ग खुल जाता है। 'सम्यगयनं ज्ञानमस्मादिति' ज्ञान का सम्यक् अयन इससे होता है इसलिए इसे समय कहते हैं।