भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

सप्तदश आह्निक वैष्णव आदि से लेकर दक्षिण तन्त्र तक शास्त्रों के अनुशासन में जो लोग स्थित हैं¹ या उन उन शास्त्रों से जिन्होंने व्रत धारण कर लिया है, और जो लोग उत्तम शासन में स्थित होते हुए भी ऐसे गुरुओं की सेवा में निरत रहते हैं जिन्हें उर्ध्व शासन के अधिकार प्राप्त नहीं है, ऐसे मनुष्य जब परमेश्वर के शक्तिपात के द्वारा उनकी ओर उन्मुख किये जाते हैं, तब उनके लिए निम्नलिखित विधान है। तब ऐसे मनुष्य को उपवास कराकर दूसरे दिन सामान्यविधि से भगवान् के पूजन के अनन्तर उसके पूर्वकृत्य उन्हें सुनाकर परमेश्वर के सामने उपस्थित करना चाहिए। तब उसका पूर्वव्रत अर्थात् मन्त्र आदि लेकर जल में छोड़ देना चाहिए। उसके बाद उसे स्नान करना चाहिए इसके बाद उसका प्रोक्षण होना चाहिए तब उसे चरु और दन्तकाष्ठ देकर उसका संस्कार होना चाहिए। इसके अनन्तर साधारण मन्त्र से शिवस्वरूप अग्नि में उसकी व्रतशुद्धि करनी चाहिए। उसके द्वारा गृहीत मन्त्र से उसका नाम संपुटित कर 'प्रायश्चित्त का शोधन १. कश्मीर के शिवाद्वैत सिद्धान्त के अनुसार वैष्णव बौद्ध, सिद्धान्त आदि साधनधारा के जो लोग अनुगामी हैं और उन धाराओं के आचार्य से जिन्होंने दीक्षा प्राप्त कर ली है वे निम्नकोटी के शास्त्र के अनुशासन से चलते हैं। जब शिवरूपी सूर्य के किरणों से उनके हृदय कमल खिल उठते हैं अर्थात् जब उन पर शक्तिपात होता है तब उन में स्वभावतः ही सद्गुरु के समीप जाने की इच्छा उदित होता है। लेकिन तुरन्त ही उन्हें दीक्षा नहीं मिलती है। जिस प्रक्रिया से उन्हें पूर्वगुरु से प्राप्त संस्कार का दूरीकरण होता है उस प्रक्रिया का परिभाषिक नाम लिंगोद्धार है। जैसे घड़ों से दुर्गन्ध दूर करने के पहले उसे बार बार साफ किया जाता है फूलों के सुगन्ध से उसे सुगन्धित किया जाता है, उसी प्रकार असद्गुरु से संस्कार-प्राप्त मनुष्य का भी दुगुणा संस्कार आवश्यक होता है। इसलिए उसका उपवास, स्थण्डिल में पूजन, उसके पूर्व कृत्यों का भगवत्समीप में कथन, उसपर परमेश्वर के अनुग्रह प्राप्त करने के लिए आचार्य के द्वारा भगवान् से प्रार्थना, पूर्वमन्त्र का जल में विसर्जित करना आदि कार्य करना पड़ता है।