भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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१७० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १७ करता हूँ' इसका उच्चारण करते हुए स्वाहाशब्द इसके अन्त में लगाकर सौ बार हवन करना चाहिए। वौषड् मन्त्र से पूर्णाहुति होनी चाहिए तब 'व्रतेश्वर का आवाहन कर उसके पूजन के बाद' शिवजी की आज्ञा से आप इस पर अकिंचित्कर बन जाइए' इस प्रकार श्रावणा सुनवाकर उनके तर्पण करने के बाद उसे विसर्जित करना चाहिए। इसके बाद अग्नि का भी विसर्जन करना चाहिए। यह हुआ लिंगोद्धार। इसके अनन्तर अधिवास आदि की विधि पहले जैसी है। और दीक्षा यथारुचि होनी है। जो निम्नभूमि में स्थित है वह महेश्वर के शक्तिपात के कारण सद्गुरु के पास जाने के इच्छुक होता है। जो पहले असद्गुरु के प्रति सेवानिरत था उसे भी संस्कृत और दीक्षित करना उचित है। इति श्री अभिनवगुप्त रचित तंत्रसार के लिंगोद्धार नाम का सप्तदश आह्निक है।