भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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बीसवाँ आह्निक अब शेषवृत्ति के उपदेश के लिए दूसरा प्रकरण का आरम्भ किया जाता है। ज्ञानप्राप्ति की योग्यता जिनमें वर्तमान है, संस्कार की सिद्धि के लिए उन्हें जो दीक्षा दी जाती है और ज्ञान की योग्यता जिनमें नहीं है उन्हें जो सबीज मोक्षदीक्षा दी जाती है इन दोनों प्रकार दीक्षा सम्पन्न हो जाने पर उनके जीवन काल तक पालनीय शेषवृत्ति का उपदेश गुरु अवश्य करें। शेषवृत्ति नित्य, नैमित्तिक और काम्य आदि के भेद से तीन प्रकार हैं। काम्य शेषवर्तन केवल साधक के लिए है, इसलिए यहाँ उसका विवेचन नहीं हुआ है। उनमें जो नित्य है वह नियतभव है, जिनसे परमेश्वर के साथ तन्मयता उत्पन्न होती हैं वे नैमित्तिक कृत्य हैं। इसके उपयोगी सन्ध्योपासना आदि का अनुष्ठान प्रतिदिन होना चाहिए। पर्वदिन और पवित्रक आदि भी नित्य है। किसी-किसी का मत में ये भी नित्य हैं क्योंकि ये अपने काल के द्वारा नियत है। लेकिन नैमित्तिक कृत्य वे हैं जो उस शास्त्र के अनुशासन में स्थित मनुष्यों के लिए भी नियमपूर्वक नहीं माने जाते हैं। वे क्रमशः गुरु तथा उनके निजी वर्ग के शिष्य के घर पर आगमन का दिन है, उनके पर्वदिवस, उनकी दीक्षा का दिन आदि है— यह किन्हीं किन्हीं का मत है। उसमें नियमपूर्वक पूजा, सन्ध्योपासन, गुरुपूजा, पर्वपूजा, पवित्रक आदि अवश्य करने वाले कृत्य हैं, लेकिन ज्ञानलाभ, शास्त्रलाभ, गुरु और उनके वर्गों के शिष्य के घर में आगमन के दिन, गुरु का जन्म दिवस, उनके संस्कार का दिन और तिरोधान का दिन, लौकिक उत्सव, शास्त्र व्याख्या के प्रथम, मध्यम तथा अन्तिम दिन, देवतादर्शन, स्वप्न में आज्ञा प्राप्ति का दिन, मेलक, गुरु से प्राप्त समय से निष्कृतिलाभ का दिन आदि नैमित्तिक अर्चना करने का हेतु है। अब इस विषयमें उल्लेख है कि जिसने दीक्षा ग्रहण कर लिया है ऐसे शिष्य को मुख्यमन्त्र जो वीर्यमय तथा संवित्स्फुरण ही जिसका सार है उसे न लिखकर मुख से कहकर उसे अर्पित करना चाहिए।