तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८५ उसके बाद मन्त्र के साथ तन्मयभाव की सिद्धि के लिए उस शिष्य को सभी सन्ध्याओं में तन्मयभाव का अभ्यास करना चाहिए । उस उपाय से उस प्रकार संस्कार की सिद्धि के लिए प्रतिदिन परमेश्वर को स्थण्डिल या लिंग में अर्चना करना चाहिए । मनोहर स्थण्डिल को निर्मल दर्पण के समान ध्यान करते हुए उसमें अपना रूप जो यजनीय देवताचक्र के साथ अभिन्न हुआ है और उसने मूर्ति का रूप धारण कर लिया है। इस प्रकार दर्शन करने के बाद मनोहर पुष्प, गन्ध, आसव, तर्पण, नैवेद्य, धूप, दीप और अन्य उपचार आदि अर्पित कर स्तुति, गीत, वाद्य और नृत्त आदि के द्वारा पूजन करना चाहिए । जप और स्तवन करना चाहिए । शंका रहित तन्मयता की सिद्धि के लिए ये अवश्य करणीय हैं। मुकुर में अपना मुख के निरन्तर दर्शन करने वाले व्यक्ति को अपने स्वरूप के विषय में निश्चयात्मक बोध शीघ्र ही उत्पन्न हो जाता है उसी प्रकार स्तवन पूजन से परमेश्वर सम्बन्धी तन्मयता आती है । इस विषय में तन्मयभाव के अलावा किसी क्रम की प्रधानता नहीं है । सबसे उत्कृष्ट ( पर ) मन्त्र में तन्मयभाव में आविष्ट और जिस पशुरूपी जीव के हृदय से पशुवासना के कलंक के दूर हो गया है और भक्तिरस के प्लावन से पाश समूह विदूरित हो चुका है ऐसे मनुष्य में जो भाव हृदय में स्थित रहता है वही परम उपादेय है—यही हमारे गुरुओं का मत है। पारमार्थिक भावों के विस्ताररूपी-प्रकाश पर आश्रित होकर जो परमामृतमयी दृक्-शक्ति उल्लसित होती है, रहस्य के ज्ञाता आपका पूजन आप ही से करते हैं । आधार को धरा बनाकर उसे चमत्कार रूप रस के प्रोक्षण से प्रक्षालित कर मन के द्वारा संगृहीत अपने सुरभि से सुरभित स्व-भाव पुष्पों के द्वारा आनन्द तथा अमृतमय निज हृदयरूपी बहुमूल्य अर्घपात्र के द्वारा देवी के साथ तुम्हें देहरूपी देवगृह में देवता को दिन-रात हमें पूजन करना चाहिए । × × × उपर्युक्त इन दोनों श्लोकों को हृदय में भावना के साथ देवता चक्र का पूजन होना चाहिए । उसके बाद मुद्रा का प्रदर्शन, जप, जप