तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २० का निवेदन करना है। अपने बोधमय स्वरूप में देवताचक्र को विसर्जित करना है। मुख्य नैवेद्य को स्वयं ग्रहण करें या सभी वस्तुओं को जल में त्याग देना चाहिए। जल में उत्पन्न जीवसमूह चरु के भोजन के द्वारा आगम के ज्ञाता बन गये हैं। अगर बिल्ली, मूष और कुत्ते आदि के द्वारा चरु का भोजन हो तो हृदय में शंका उत्पन्न होने पर ही वह नरक का कारण बनती है। इसलिए ज्ञानी पुरुष लोकानुग्रह करने की इच्छा से कोई विपरीत कार्य न करें। अर्थात् स्वयं शङ्कारूप संकोच का त्याग करें। वह लोकसम्पर्क को छोड़ कर रहें। यह हुआ स्थण्डिल का विवरण । इसके अनन्तर लिंग में पूजन होना चाहिए। रहस्यमन्त्रों से लिंग की स्थापना नहीं करना चाहिए, विशेषरूप से व्यक्त लिङ्ग की। पूर्व से स्थापित लिङ्ग का पूजन आवाहन, विसर्जन आदि क्रम से करना है क्यों कि वही आधार है। गुरु का शरीर, निज शरीर, शक्ति का शरीर, रहस्यशास्त्र की पुस्तकें, वीर पात्र, अक्षसूत्र, प्राहरण, वाण- लिङ्ग, मोती से बने लिङ्ग, सुवर्णनिर्मित लिङ्ग, पुष्प, गन्धद्रव्यादि, मनोहर वस्तु से बने मुकुर या लिङ्ग की अर्चना करना चाहिए। आधार की सुन्दरता के बल से ही मन्त्र की अधिक सिद्धि होती है। इस क्रम में उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व की प्रधानता है। क्योंकि मन्त्र समूह आधार के गुणों का ही अनुविधायी हैं। भिन्न-भिन्न वस्तुओं को साध्य बनाने पर भिन्न-भिन्न वस्तु की प्रधानता होती है—यही शास्त्र- गुरुओं का निर्देश है। सर्वत्र परमेश्वर सम्बन्धी अभिन्नता का अभिमान ही उत्कृष्ट संस्कार है। अब पर्व का विधान है पर्व सामान्य, सामान्य-सामान्य, सामान्य-विशेष, विशेष-सामान्य, विशेष, विशेष-विशेष आदि छः प्रकार हैं। इनसे विधि की पूर्ति होती है। हर महीने के प्रथम और पंचम दिन सामान्य पर्व है। चौथा, आठवाँ, चौदहवाँ और पन्द्रहवाँ दोनों पक्ष के दिन सामान्य-सामान्य पर्व हैं। इन दोनों पक्षों के आगे बतलाये जाने वाले भिन्न-भिन्न तिथियों में ग्रह तथा नक्षत्र के संयोग से सम्बन्धित दिन सामान्य-विशेष नाम का पर्व हैं। अग्रहायण मास के कृष्ण नवमी के प्रथम रात्रि का भाग, पौष महीने के