भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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आ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८७ कृष्ण-नवमी का रात्रिमध्य, माघ महीने के शुक्ल पंचदशी की मध्यरात्रि, फाल्गुन महीने के शुक्ल द्वादशी के दिन का मध्य भाग, चैत्र महीने के शुक्ल त्रयोदशी, वैशाख की कृष्णाष्टमी, ज्येष्ठ की शुक्लानवमी, आषाढ़ का पहला दिन, श्रावण की कृष्णा एकादशी तिथि के दिन का पहला भाग, भाद्र को शुक्ला षष्ठी के दिन का मध्य भाग, आश्विन शुक्ला नवमी का दिन, कार्तिक की शुक्ला नवमी की रात्रि का प्रथम भाग विशेष पर्व के दिन हैं। चित्रा नक्षत्र तथा चन्द्र, मघा तथा बृहस्पति, तिष्या तथा चन्द्र, पूर्वफाल्गुनी तथा बुध, श्रवणा तथा बुध, शतभिषा तथा चन्द्र, मूला तथा रवि, रोहिणी तथा शुक्र, विशाखा तथा बृहस्पति, श्रवणा तथा चन्द्र आदि के संयोग से भिन्न भिन्न पर्व के दिन बनते हैं। यदि अग्रहायण के महीने से आरम्भ होकर यथासंख्य संयोग उपस्थित हो तो आश्विन के महीने को छोड़कर जो पर्व हैं उसे विशेष- विशेष पर्व कहते हैं। अन्य प्रकार विशेष अन्य पर्व में हो तो उसे अनुयाग कहते हैं। भगृह के योग होने पर बेला की प्रधानता नहीं होती, तिथि ही विशेषता का सम्पादक है। अनुयागकाल में करणीय कृत्यों की अनुवृत्ति ही पर्व के दिन में मुख्य कृत्य है। पर्व यागों में अनुयाग को ही प्रधानता है। मूर्तियाग, चक्रयाग अनुयाग के ही पर्याय हैं। इस याग में गुरु, सन्तानों के साथ गुरु के अनुयायी, तत्त्वज्ञानी पुरुष, कन्या, अन्त्या, वेश्या, अरुणा या तत्त्वज्ञा महिला चक्रयाग में मुख्य रूप से पूजा करने योग्य हैं, विशेष रूप से सामूहिक रूप में पूजन करना चाहिए। चक्रयाग में गुरु मध्यभाग में और उन्हें घेर कर गुरु से लेकर समयी तक शिष्य गणों को वीर और शक्ति के क्रम से बैठना चाहिए। चक्र के आकार में या पंक्ति के क्रम से वे बैठते हैं। इसके अनन्तर गन्ध, पुष्प धूप आदियों से उनका पूजन होना चाहिए। इसके बाद पात्र को जो सदाशिव का ही रूप है इस प्रकार चिन्तन करने के बाद उसे आसव से जो शक्तिरूप अमृतमय है इस प्रकार ध्यान करते हुए भरना चाहिए। तब उसमें भोक्त्री शक्ति को शिवरूप में पूजन करने के बाद उस शक्तिरूप आसव से देवताचक्र का तर्पण करना चाहिए। इसके अनन्तर नरशक्ति शिवात्मक इन तीनों का मेलक उसमें