भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

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१८८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २० हुआ है इस प्रकार चिन्तन करने के बाद आवरणरूपी जो चक्र है उस का भी तर्पण जो भोग और मोक्ष प्रधान है होना चाहिए, यह तर्पण बाह्य और आन्तर दोनों हों। पहले गुरु से चक्र के अन्त तक फिर अन्त से गुरु तक पात्र का भ्रमण होने से चक्र की पूर्णता होती है। आधार जो विश्वमय है उस पर पात्र को स्थापित कर देवता चक्र को तर्पित कर उसे पहले स्तवन और नमन के बाद अपने को तर्पित करना चाहिए। अगर अपने पास पात्र न हो तो भद्र या वेल्लितशुक्ति से अर्थात् दाहिने हाथ को पात्र का आकार बनाना भद्र, दोनों हाथों में दाहिने हाथ को बायें के ऊपर बिना कोई छेद को हो तो उसे वेल्लित- शुक्ति कहते हैं। हाथ से कुछ बूँदें गिरती है तो उनसे बेताल तथा गुह्यकगण तृप्त होते हैं। आसव की धारा से भैरव की तृप्ति होती है। इस चक्रयाग में भूल से किसी का प्रवेश हो तो उस व्यक्ति के विषय में कोई विचार न करना चाहिए। भीतर आने पर फिर से दोबारा चक्रयाग करना चाहिए। इसके अनन्तर अवदंश और भोज्य वस्तुओं को काफी मात्रा में सामने रख देना चाहिए। या गुप्तगृह में चक्रयाग में सम्मिलित सभी के वास्तविक नाम को वर्जित कर देवता शब्द से उनका अभिधान होना चाहिए। यह हुआ वीरसंकरयाग का विवरण। अन्त में दक्षिणा, ताम्बूल और वस्त्र आदि से उन सभी को सन्तुष्ट करना चाहिए। यह मुख्यतम मूर्तियाग है। अदृष्टमण्डल भी मूर्तियाग के द्वारा पर्वदिन में पूजन करते हुए एक वर्ष से ही पुत्रक शिष्य जो फल प्राप्त करता उसे प्राप्त करता है—इसे प्राप्त करने में सन्ध्या आदि के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। यह वृद्ध, भोगी, स्त्री आदि के उपयोगी विधि है—इस विधि का उपदेश शक्तिपात होने पर गुरु के द्वारा होना चाहिए। अब पवित्रक विधि का विवरण है यह श्रीरत्नमाला, त्रिशिरोमत, श्रीसिद्धामत आदि ग्रन्थ में विधियों का पूरक है और परमेश्वर की आज्ञा का परिपूरक है। इस विषय में श्री तन्त्रालोक में कहा गया— बिना पवित्रक से सब कृत्य निष्फल है आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष से कुलपूर्णिमा के अन्तिम दिन तक