तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८३ पवित्रक का अनुष्ठान करणीय है। इस विषय में कार्तिक महीने के कृष्ण पञ्चदशी तिथि में पवित्रक विधि के अनुष्ठान से कुलचक्र तथा नित्याचक्र की पूर्ति होती है—यह श्रीनित्यातन्त्रविद् ज्ञानियों का मत है। माघ महीने की शुक्लापञ्चदशी ही इसका पूरक है ऐसा श्रीभैरवकुलोर्मिविद् ज्ञानियों की सम्मति है। दक्षिणायन के समाप्ति की पञ्चदशी तिथि ही विधि का पूरक है, यह श्रीतन्त्रसद्भाव के ज्ञाताओं का सिद्धान्त है। अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार परमेश्वर के पूजन के बाद हवन, तर्पण समाप्त कर पवित्रक को अर्पित करना चाहिए। पवित्रक स्वर्ण, मोती आदि से रचित होकर रेशम के सूत, कपास, कुश आदि से भी बनाना चाहिए, पवित्रक में तत्त्व संख्या ( ३६ ) के अनुसार ग्रन्थियाँ होनी चाहिए, पद, कला, भुवन, वर्ण, मन्त्र आदि की संख्या के अनुसार ग्रन्थियों से युक्त घुटने तक एक, नाभि तक दूसरा, कण्ठ तक एक, मस्तक पर एक—इन चार पवित्रक परमेश्वर को और गुरु को जो सब अध्वाओं से परिपूर्ण है, इस प्रकार भावना के साथ और उस स्वरूप की प्राप्ति के निमित्त अर्पित करना चाहिए, शेष जो रहे उसे एक देना चाहिए। पवित्रक अर्पित करने के बाद महोत्सव करना चाहिए। चारो महीनों में सात दिन तक या तीन दिन तक या आपत्ति के समय मुख्य पवित्रक एक दिन अर्पित करें। आर्थिक वैभव हो तो हर महीने में पवित्रक अर्पित करना चाहिए। अथवा चारों महीनों में या एक बार। पवित्रक-विधि के अनुष्ठान न करने पर प्रायश्चित्त करना चाहिए। ज्ञानी मनुष्य के पास धन की कमी भी हो तो भी इसके न करने से प्रत्यवाय होता है। जो लोग लोभ से कलुषित चित्त है अथवा ज्ञानी हैं उनके द्वारा इसके न करने से ज्ञान की ही निन्दा है—इस विषय के समर्थन निम्न प्रकार का वचन है— 'विज्ञान प्राप्त करने के बाद जो परमेश के द्वारा कथित शास्त्र को दूषित करता है उसे प्रायश्चित करना पड़ता है।' यह पवित्रक विधि है ज्ञानलाभ के समय और लौकिक उत्सव के अन्त में भी सब जगह संविदुल्लास की अधिकता होती है जिस समय विशेषरूप से देवता चक्र का सन्निधान होता है, अतः उस प्रकार अधिकता के पर्यालोचन से उसी प्रकार विशेष का अनुष्ठान अनुयाग में करना चाहिए।