तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २० अब व्याख्या की विधि है सब शास्त्रों के ज्ञान से परिपूर्ण गुरु को शास्त्र की व्याख्या के लिए पूजन करना चाहिए। गुरु भी अपने तथा दूसरे के शिष्यों को उनके संस्कार के अनुरूप शास्त्र की व्याख्या करनी चाहिए। जो लोग निम्न- कोटि के शास्त्रों के अनुयायी हैं उन्हें भी गुरु करूणावश ईश्वर की इच्छा से उत्पन्न विचित्र प्रकार के शक्तिपात की सम्भावना होती है इस प्रकार भावना से भक्तिचित्त होकर शास्त्र की व्याख्या करें, केवल गूढ़तात्पर्य को गुप्त रखें। शास्त्रव्याख्या के श्रवण के इच्छुक शिष्य नीचे आसन पर बैठें। शास्त्र सुनने के लिए उत्सुक होकर, शरीर, वाक् मन को संयमित रखकर जब वे शास्त्र को सुनते हैं तब व्याख्या सफल होतो है। पहले गन्ध आदि से लिपो हुई भूमि पर कमलाधार चतुष्कोण मण्डल में तीन कमल अंकित कर या मन में संकल्प कर कमल के मध्य में वागीशी, बायें और दाहिने गणेश और गुरु को पूजन करना चाहिए। आधारकमल में व्याख्येय शास्त्र के अधिपति को पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर सामान्यार्घपात्र से चक्र का तर्पण होना चाहिए। इसके बाद सूत्र, वाक्य और पटलात्मक ग्रन्थ का व्याख्यान होना चाहिए। व्याख्या पूर्वापर अविरुद्ध हो तथा तन्त्र, आवृत्ति, प्रसंग, समुच्चय विकल्प प्रभृति के उद्भावन के द्वारा युक्ति के अनुसार पूर्वपक्ष को सम्यक् प्रकार से उपस्थित करने के बाद उसमें दोष लगाकर (खण्डन करने के बाद) अपने साध्य वस्तु को साधन करते हुए पटल (अध्याय) तक की व्याख्या करनी चाहिए। वाच्य वस्तु के अनन्तर चक्रदेवता का तर्पण पूजन आवश्यक है जब तक व्याख्या की समाप्ति नहीं होती है। जब समाप्ति होती है तब विद्यापीठ के पूजन के अनन्तर उसे विसर्जित कर उस स्थान को लिपने के बाद उसे अथाह जल में फेकना चाहिए। यह हुई व्याख्या की विधि अब समय निष्कृति है यद्यपि तत्त्वज्ञान में निष्णात व्यक्ति के लिए किसी प्रकार प्रायश्चित नहीं है तो भी जो लोग केवल चर्या (आचार) मात्र के मांक्षभागी हैं उन पर अनुग्रह प्रदर्शित करने के लिए आचार का मार्ग उन्हें दिखाना