तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९१ चाहिए। जो लोग तत्त्वज्ञानी नहीं अपितु चर्या पर ही निर्भर करते हैं और भोग और मोक्ष प्राप्त करते हैं, वे अगर समय ( यह कर्तव्य है और यह अकर्तव्य है गुरु के द्वारा उपदिष्ट विधि ) का उल्लंघन करते हैं और अपराध का प्रायश्चित्त नहीं करते हैं, वे सौ वर्षों तक क्रव्यादि नरक में कष्ट भोगते हैं, इसलिए प्रायश्चित्त की विधि का उल्लेख होना चाहिए। स्त्री के वध होने पर कोई प्रायश्चित्त नहीं है। ( उसका फल भोगना ही पड़ता है)। इसे छोड़कर अपराध के बलाबल जानकर अखण्डा भगवती मालिनी की आवृत्ति एक बार से तीन लाख तक होनी चाहिए। जब तक शंका की निवृत्ति न हो। इसके बाद विशेषपूजा, उसमें भी चक्रयाग। यह सर्वत्र शेषकृत्य है। इति समयनिष्कृति । अब गुरुपूजा की विधि है। सब प्रकार यागों के अन्त में याग सम्पन्न हो जाने पर दूसरे दिन गुरु की पूजा करनी चाहिए। पहले आचार के अंग के रूप में उनका पूजन हुआ था, प्रधानरूप से नहीं। उन्हें प्रधानरूप से पूजन न करने पर अधिकारबन्ध से शिष्य बद्ध होता है, अतः सर्वथा उनकी पूजा करनी चाहिए। एक स्वस्तिक मण्डल की रचना कर उस पर सोने का पीठ रखकर उस पर सभी अध्वाओं के पूजन के बाद उस पीठ पर श्रीगुरुदेव अधिष्ठित हैं इस प्रकार विचार करते हुए उनकी पूजा, उनका तर्पण, भोजन, दक्षिणा के रूप में अपने को अर्पित कर उन्हें दिये हुए नैवेद्य का अंश मांगकर उसे प्रणाम कर स्वयं खाकर चक्रपूजा करनी चाहिए। यह हुई गुरुपूजा की विधि। नित्य, नैमित्तिक आदि कृत्य वित्तशाठ्य के बिना करनेवाला ज्ञान और योग के बिना ही केवल चर्या से मुक्त होता है। इति श्रीअभिनवगुप्तप्ताचार्य द्वारा रचित तन्त्रसार का बिसवाँ आह्निक है।