तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
१९० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २० अब व्याख्या की विधि है सब शास्त्रों के ज्ञान से परिपूर्ण गुरु को शास्त्र की व्याख्या के लिए पूजन करना चाहिए। गुरु भी अपने तथा दूसरे के शिष्यों को उनके संस्कार के अनुरूप शास्त्र की व्याख्या करनी चाहिए। जो लोग निम्न- कोटि के शास्त्रों के अनुयायी हैं उन्हें भी गुरु करूणावश ईश्वर की इच्छा से उत्पन्न विचित्र प्रकार के शक्तिपात की सम्भावना होती है इस प्रकार भावना से भक्तिचित्त होकर शास्त्र की व्याख्या करें, केवल गूढ़तात्पर्य को गुप्त रखें। शास्त्रव्याख्या के श्रवण के इच्छुक शिष्य नीचे आसन पर बैठें। शास्त्र सुनने के लिए उत्सुक होकर, शरीर, वाक् मन को संयमित रखकर जब वे शास्त्र को सुनते हैं तब व्याख्या सफल होतो है। पहले गन्ध आदि से लिपो हुई भूमि पर कमलाधार चतुष्कोण मण्डल में तीन कमल अंकित कर या मन में संकल्प कर कमल के मध्य में वागीशी, बायें और दाहिने गणेश और गुरु को पूजन करना चाहिए। आधारकमल में व्याख्येय शास्त्र के अधिपति को पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर सामान्यार्घपात्र से चक्र का तर्पण होना चाहिए। इसके बाद सूत्र, वाक्य और पटलात्मक ग्रन्थ का व्याख्यान होना चाहिए। व्याख्या पूर्वापर अविरुद्ध हो तथा तन्त्र, आवृत्ति, प्रसंग, समुच्चय विकल्प प्रभृति के उद्भावन के द्वारा युक्ति के अनुसार पूर्वपक्ष को सम्यक् प्रकार से उपस्थित करने के बाद उसमें दोष लगाकर (खण्डन करने के बाद) अपने साध्य वस्तु को साधन करते हुए पटल (अध्याय) तक की व्याख्या करनी चाहिए। वाच्य वस्तु के अनन्तर चक्रदेवता का तर्पण पूजन आवश्यक है जब तक व्याख्या की समाप्ति नहीं होती है। जब समाप्ति होती है तब विद्यापीठ के पूजन के अनन्तर उसे विसर्जित कर उस स्थान को लिपने के बाद उसे अथाह जल में फेकना चाहिए। यह हुई व्याख्या की विधि अब समय निष्कृति है यद्यपि तत्त्वज्ञान में निष्णात व्यक्ति के लिए किसी प्रकार प्रायश्चित नहीं है तो भी जो लोग केवल चर्या (आचार) मात्र के मांक्षभागी हैं उन पर अनुग्रह प्रदर्शित करने के लिए आचार का मार्ग उन्हें दिखाना
आ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९१ चाहिए। जो लोग तत्त्वज्ञानी नहीं अपितु चर्या पर ही निर्भर करते हैं और भोग और मोक्ष प्राप्त करते हैं, वे अगर समय ( यह कर्तव्य है और यह अकर्तव्य है गुरु के द्वारा उपदिष्ट विधि ) का उल्लंघन करते हैं और अपराध का प्रायश्चित्त नहीं करते हैं, वे सौ वर्षों तक क्रव्यादि नरक में कष्ट भोगते हैं, इसलिए प्रायश्चित्त की विधि का उल्लेख होना चाहिए। स्त्री के वध होने पर कोई प्रायश्चित्त नहीं है। ( उसका फल भोगना ही पड़ता है)। इसे छोड़कर अपराध के बलाबल जानकर अखण्डा भगवती मालिनी की आवृत्ति एक बार से तीन लाख तक होनी चाहिए। जब तक शंका की निवृत्ति न हो। इसके बाद विशेषपूजा, उसमें भी चक्रयाग। यह सर्वत्र शेषकृत्य है। इति समयनिष्कृति । अब गुरुपूजा की विधि है। सब प्रकार यागों के अन्त में याग सम्पन्न हो जाने पर दूसरे दिन गुरु की पूजा करनी चाहिए। पहले आचार के अंग के रूप में उनका पूजन हुआ था, प्रधानरूप से नहीं। उन्हें प्रधानरूप से पूजन न करने पर अधिकारबन्ध से शिष्य बद्ध होता है, अतः सर्वथा उनकी पूजा करनी चाहिए। एक स्वस्तिक मण्डल की रचना कर उस पर सोने का पीठ रखकर उस पर सभी अध्वाओं के पूजन के बाद उस पीठ पर श्रीगुरुदेव अधिष्ठित हैं इस प्रकार विचार करते हुए उनकी पूजा, उनका तर्पण, भोजन, दक्षिणा के रूप में अपने को अर्पित कर उन्हें दिये हुए नैवेद्य का अंश मांगकर उसे प्रणाम कर स्वयं खाकर चक्रपूजा करनी चाहिए। यह हुई गुरुपूजा की विधि। नित्य, नैमित्तिक आदि कृत्य वित्तशाठ्य के बिना करनेवाला ज्ञान और योग के बिना ही केवल चर्या से मुक्त होता है। इति श्रीअभिनवगुप्तप्ताचार्य द्वारा रचित तन्त्रसार का बिसवाँ आह्निक है।
अथैकविंशमाह्निकम् एवं समस्तं नित्यं नैमित्तिकं कर्म निरूपितम् । अधुना अस्यैव आग- मस्य प्रामाण्यम् उच्यते । तत्र संविन्मात्रमये विश्वस्मिन् संविदि च विमर्शात्मिकायां, विमर्शस्य च शब्दनात्मकतायां सिद्धायां, सकलजग- न्निष्ठवस्तुनः तद्गतस्य च कर्मफलसंबन्धवैचित्र्यस्य यत् विमर्शनं तदेव शास्त्रम्—इति परमेश्वरस्वभावाभिन्न एव समस्तः शास्त्रसंदर्भों वस्तुत एकफलप्रापकः एकाधिकार्युद्देशेनैव, तत्र तु परमेश्वरनियतशक्तिमहिम्नैव भागे भागे रूढिः लोकानाम् इति । केचित् मायोचितभेदपरामर्शात्मनि वेदागमादिशास्त्रे रूढाः, अन्ये तथाविध एव मोक्षाभिमानेन सांख्यवैष्णव- शास्त्रादौ, परे तु विविक्तशिवस्वभावामर्शनसारे शैवसिद्धान्तादौ, अन्ये सर्वमयपरमेश्वरतामर्शनसारे मतङ्गादिशास्त्रे, केचित् तु विरल विरलाः समस्तावच्छेदबन्ध्यस्वात्मानन्दपरमार्थसंविन्मयपरमेश्वरस्वरूपामर्श - नात्मनि श्रीत्रिकशास्त्रक्रमे, केचित् तु पूर्वपूर्वेत्यागक्रमेण लङ्घनेन वा— इत्येवम् एकफलसिद्धिः एकस्मादेव आगमात् । भेदवादेऽपि समस्तागमा- नाम् एकेश्वरकार्यत्वेऽपि प्रामाण्यं तावत् अवस्थितम्, प्रामाण्यनिबन्धनस्य एकदेशसंवादस्य अविगीतताया अनिदन्ताप्रवृत्तेश्च तुल्यत्वात्, परस्पर- बाधो विषयभेदात् अकिंचित्करः। ब्रह्महननतन्निषेधवत् संस्कारभेदः संस्कारातिशयः तदभावे क्वचित् अनधिकृतत्वम् इति समानम्—आश्रम- भेदवत्, फलोत्कर्षाच्च उत्कर्षः—तत्रैव उपनिषद्भागवत्, भिन्नकर्तृक- त्वेऽपि सर्वसर्वज्ञकृतत्वमत्र संभाव्यते—तदुक्ततदतिरिक्तयुक्तार्थयोगात्, नित्यत्वेपि आगमानां प्रसिद्धिः तावत् अवश्योपगम्या—अन्वयव्यतिरे- काध्यक्षादीनां तत्प्रामाण्यस्य तन्मूलत्वात्, ‘सत्यं रजतं पश्यामि’ इति हि सौवर्णिकादिपरप्रसिद्धयैव, प्रसिद्धिरेव आगमः सा काचित् दृष्टफला ‘बुभुक्षितो भुङ्क्ते’ इति बालस्य प्रसिद्धित एव तत्र तत्र प्रवृत्तिः नान्वय- व्यतिरेकाभ्यां—तदा तयोः अभावात्, यौवनावस्थायां तद्भावोऽपि अकिंचित्करः, प्रसिद्धिं तु मूलीकृत्य सोऽस्तु कस्मैचित् कार्याय, काचित् अदृष्टवैदेह्य-प्रकृतिलय-पुरुषैकवल्यफलदा, काचित् शिवसमानत्वफलदा, काचित् ऐक्यपर्यवसायिनी, सा च प्रत्येकम् अनेकविधा—इत्येवं बहुतर- प्रसिद्धिपूर्णे जगति यो यादृशो भविष्यन् स तादृशीमेव प्रसिद्धिं बलादेव
आ. २१ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९३ हृदयपर्यवसायिनीम् अभिमन्यते—इति रिक्तस्य जन्तोः अतिरिक्ता वाचो- युक्तिः, तासां कांचन प्रसिद्धिं प्रमाणीकुर्वता अभ्युपगन्तव्यमेव आगम- प्रामाण्यम्, इति स आगम आश्रयणीयो यत्र उत्कृष्टं फलम्, इत्यलमन्येन । संवित्प्रकाशपरमार्थतया यथैव भात्यामृशत्यपि तथेति विवेचयन्तः । सन्तः समस्तमयचित्प्रतिभाविमर्श- सारं समाश्रयत शास्त्रमनुत्तरात्म ॥ जिस्स दढपसिद्धिघडिए ववहारे सोइ अस्मि णीसंको । तह होहि जहुत्तिण पसिद्धिरूढिए परमसिवो ॥ निजदृढप्रसिद्धिघटिते व्यवहारे लोक अस्ति निःशङ्कः । तदा भवति जनोत्तीर्णप्रसिद्धिरूढः परमशिवः ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे आगमप्रामाण्य- प्रकाशनं नाम एकविंशमाह्निकम् ॥ २१ ॥ १३
एकविंश आह्निक समस्त नित्य और नैमित्तिक कर्मों का वर्णन इस प्रकार से किया गया है। अब आगम के प्रामाण्य के विषय में कहा जा रहा है। संवित् ही जिसका एकमात्र स्वभाव है ऐसी जो विश्वात्मक संवित् है वह वास्तव में विमर्शस्वभाव है और विमर्श भी शब्दात्मक (वाग्रूपी) सिद्ध होने के कारण, समग्र विश्वमें सभी वस्तुओं के और उनसे सम्बन्धित कर्मफल की विचित्रता के सम्बन्ध में जो शब्दात्मक विमर्श (विचार) है वही शास्त्र है। अतएव परमेश्वर के स्वभाव से अभिन्न समग्र शास्त्रसमूह वास्तविकतया एक ही फल का प्रापक है, परन्तु एक से अधिक कार्यों के उद्देश्य से भिन्न-भिन्न शास्त्रों के प्रति लोगों की दृढ़निष्ठा परमेश्वर की नियतिशक्ति के महिमा के कारण उत्पन्न होती है। कुछ लोग मायाशक्ति के द्वारा उत्पन्न भेद-विमर्शात्मक वेदागम- रूप शास्त्र में दृढ़निष्ठा प्राप्त करते हैं, दूसरे लोग भी उसी प्रकार मोक्षा- भिमान से सांख्य और वैष्णवादि शास्त्रों के प्रति निष्ठाशील हैं, फिर दूसरे लोग विविक्त (विश्वोत्तीर्ण) शिव-स्वभाव के आमर्शन ही जिसका सार है ऐसे शैवसिद्धान्त आदि शास्त्रों में, फिर दूसरे सर्वमय परमेश्वर के आमर्शनात्मक मतंगादिशास्त्रों में, कुछ लोग जो बहुत ही विरल हैं सब प्रकार अवच्छिन्नता से रहित स्वातंत्र्यानन्द रूप परमार्थसंविन्मय परमेश्वर के आमर्शात्मक त्रिकशास्त्र के क्रम में, कुछ लोग पूर्व-पूर्व शास्त्रों को त्यागते हुए या उनके उल्लंघन से परमार्थ के मार्ग में प्रविष्ट होते हैं, अतः इससे सिद्ध होता है कि एक प्रकार फल की सिद्धि एक ही आगम से होती है। भेदवाद में भी (अर्थात् न्यायवैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार भी) सभी आगमों का प्रामाण्य एक मात्र ईश्वर से रचित होने के कारण ही सिद्ध होता है। प्रामाण्य के कारण ही एक जगह सत्यतासम्बन्धी अविरोध उत्पन्न होता है और कार्य में प्रवृत्ति आती है और यह इस प्रकार नहीं है, ऐसा जानकर किसी विषय में प्रवृत्ति नहीं होती है, अतः दोनों समान हैं, अतः एक दूसरे से जो विरोध है वह विषय की भिन्नता के कारण होता है इसलिए यह अकिञ्चित्कर है। ब्रह्महत्या और उसका निषेध जैसे संस्कार भेद और संस्कार का अतिशय
आ. २१ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९५ अर्थात् उत्कृष्ट संस्कार है, और इस प्रकार संस्कार के अभाव होने पर जैसे उस विषय में उस व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं रहता है, अतः यह तुल्य ही है, क्योंकि आश्रम की भिन्नता के कारण अधिकार- भेद जैसे अवश्य स्वीकार्य होता है । फल के उत्कर्ष के कारण शास्त्र का उत्कर्ष माना जाता है। इस विषय में भी ( वेदों से ) भागवती उपनिषत् उत्कृष्ट है। भिन्न-भिन्न कर्ताओं से रचित होने पर भी सभी शास्त्र की रचना अन्ततोगत्या सर्वज्ञ के द्वारा ही हुई ऐसा मानना पड़ता है क्यों कि उनके द्वारा कही गयी विषयों के उनसे अतिरिक्त विषयों का योग उन्हीं से है। आगमों की नित्यता मानने पर भी प्रसिद्धि अवश्य स्वीकार्य है। अन्वय व्यतिरेक ( अनुमान ) और प्रत्यक्ष आदि और उनका प्रामाण्य प्रसिद्धि ( आगम ) मूलक है ! 'सत्य रजत देखता हूँ' इस प्रकार सौवर्णिकादि दूसरे के प्रामाण्यवश सिद्ध होता है। प्रसिद्धि ही आगम है। वह प्रसिद्धि कभी दृष्टफलक है जैसे भूखा आदमी भोजन करता है, अतः हम देखते हैं कि प्रसिद्धि के अनुसार भोजन आदि कार्यों में बालकों की प्रवृत्ति होती है, अन्वय व्यतिरेक से ( अनुमान से ) नहीं। शैशव में अन्वय व्यतिरेक का अभाव रहता है। युवावस्था में अन्वय व्यतिरेक की संभावना हो तो उस समय उससे कोई विशेष फल की प्राप्ति नहीं होती । प्रसिद्धिरूप मूल कारण को स्वीकार करते हुए अन्वय- व्यतिरेक हो तो ठीक है और उससे कोई कार्य की सिद्धि हो तो कोई आपत्ति नहीं उठती है। प्रसिद्धि जैसे दृष्टफल देनेवाली है वैसी वह अदृष्टफल देनेवाली भी है जैसे विदेह-कैवल्य, प्रकृतिलय, पुरुष कैवल्य आदि । कुछ प्रसिद्धि और शिवसाम्य स्वरूप देनेवाली, कुछ शिवैक्य देनेवाली है। दृष्टफल देनेवाली अदृष्ट फल देनेवाली प्रसिद्धियाँ भी अनेक प्रकार हैं—इस प्रकार नानाविध प्रसिद्धिपूर्ण जगत में जो जिस प्रकार स्थिति प्राप्त करनेवाला है वह उसी प्रकार प्रसिद्धि आकस्मिक रूप से अपने हृदय के अनुकूल मानकर ग्रहण करता है। अतः जो रिक्त है उसे अतिरिक्त वचन की क्या आवश्यकता है। उनमें से किसी एक प्रसिद्धि को प्रमाण के रूप में ग्रहण करनेवाले के द्वारा अवश्य स्वीकार करने योग्य आगमरूपी प्रामाण्य है । अतः उसी आगम का शरण लेना उचित है जहाँ फल उत्तम है। अब अन्य विषय की आलोचना से क्या लाभ है ?
१९६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २१ संवित् प्रकाशरूपी परमार्थ जिस प्रकार प्रकाशमान् रहकर विमर्शन- शील है सज्जनगण उसे उसी प्रकार हृदय से विचार करते हैं, अतः सभी में स्थित चित्प्रतिभाविमर्श के साररूपी अनुत्तरात्मक शास्त्र का आश्रयण कीजिये। अपने सुदृढ़ विश्वास से निर्मित व्यवहार में मनुष्य शंका ( संशय ) रहित रहता है। परमशिवरूपी प्रसिद्धि में दृढ़निष्ठा उत्पन्न होने पर मनुष्य परमशिव बनता है। इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य के द्वारा रचित तन्त्रसार के आगम प्रामाण्य प्रकाशन नाम का इक्कीसवाँ आह्निक है।
अथ द्वाविंशमाह्निकम् अथ समस्ता इयम् उपासा समुन्मिषत्तादृशदृढवासनारूढान् अधि- कारिणः प्रति श्रीमत्कौलिकप्रक्रियया निरूप्यते, तत्र उक्तं योगसंचारादौ आनन्दं ब्रह्म तद्देहे त्रिधौष्ठचान्त्यव्यवस्थितम् । अब्रह्मचारिणस्तस्य त्यागादानन्दवर्जिताः ॥ आनन्दकृत्रिमाहारवर्जं चक्रस्य याजकाः । द्वयेऽपि नरके घोरे तस्मादेनां स्थितिं भजेत् ॥ तदनया स्थित्या कुलयागः, स च षोढा—बाह्ये शक्तौ स्वदेहे यामले प्राणे संविदि च इति । तत्र च उत्तर उत्तर उत्कृष्ट, पूर्वः पूर्वस्तदुच्च्यर्थम् । सिद्धिकामस्य द्वितीयतुर्यपञ्चमाः सर्वथा निर्वर्त्याः, षष्ठस्तु मुमुक्षोः मुख्यः, तस्यापि द्वितीयाद्या नैमित्तिके यथासंभवम् अनुष्ठेया एव विधिपूरणार्थं च । तत्र बाह्यं स्थण्डिलम्, आनन्दपूर्णं वीरपात्रं, अरुणः पटः, पूर्वोक्त- मपि वा लिङ्गादि । तत्र स्नानादिकर्तव्यानपेक्षयैव पूर्णानन्दविश्रान्त्यैव लब्धशुद्धिः प्रथमं प्राणसंविद्देहैकीभावं भावयित्वा संविदश्च परमशिवरूप- त्वात् सप्तविंशतिवारं मन्त्रम् उच्चार्य मूर्ध-वक्त्र-हृद्गुह्य-मूर्तिषु अनुलोम- विलोमाभ्यां विश्वाध्वपरिपूर्णता परमेश्वरे अपरत्वे परापरत्वे परत्वेऽपि च । तथाहि—माया-पुं-प्रकृति-गुण-धी-प्रभृति धरान्तं सप्तविंशतित- त्त्वानि—कलादीनां तत्रैव अन्तर्भावात्, विद्याशक्तावपि परापरत्वे ब्रह्म- पञ्चकस्य सद्यस्त्वोजातातद्भवोद्भूतवादीनां धर्माणां सप्तविंशतिरूपत्वमेव उक्तं श्रीमत्कुलेशादिपादैः । परत्वेऽपि पञ्चशक्तिः हि परमेश्वरः, प्रति- शक्ति च पञ्चरूपता, एवं पञ्चविंशतिः शक्तयः, ताश्च अन्योन्यम् अनुद्भि- न्नविभागा इत्येका शक्तिः, सा चानुद्भिन्नविभागा—इत्येवं सप्तविंशति- रूपया व्याप्त्या संविदग्नेः शिखां बुद्धिप्राणरूपां सकृदुच्चारमात्रेणैव बद्धां कुर्यात्—येन परमशिव एव प्रतिबद्धो तद्व्यतिरिक्तं न किंचिदभिधावति, तथाविधबुद्धयधिष्ठितकरणचक्रानुवेधेन पुरोवर्तिनो यागद्रव्यगृहदिगा- धारादीनपि तन्मयीभूतान् कुर्यात्, ततोऽर्घपात्रमपि शिखाबन्धनव्याप्त्यैव पूरयेत् पूजयेच्च, तद्विप्रुड्भिः स्थण्डिलान्यपि तद्रसेन वामानामाङ्गुष्ठयो- गात् देहचक्रेषु मन्त्रचक्रं पूजयेत् तर्पयेत् च, ततः प्राणान्तः, ततः स्थण्डिले
१९८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ त्रिशूलात्मकं शक्तित्रयान्तमासनं कल्पयेत्, मायान्तं हि सार्णे औकारे च शक्तित्रयान्तं तदुपरि याज्या विमर्शरूपा शक्तिः—इत्येवं सकृदुच्चा- रेणैव आधाराधेयन्यासं कृत्वा तत्रैव आधेयभूतायामपि संविदि विश्वं पश्येत्, तदपि च संविन्मयम्—इत्येवं विश्वस्य संविदा तेन च तस्याः संपुटीभावो भवति, संविद उदितं तत्रैव पर्यवसितं यतो विश्वं, वेद्याच्च संवित् उदेति तत्रैव च विश्राम्यति—इति एतावत्त्वं संवित्तत्त्वं संपुटी- भावद्वयात् लभ्यते। तदुक्तम् सृष्टिं तु संपुटीकृत्य.....................। इति। ततो गन्धधूपासवकुसुमादीन् आत्मप्रह्वीभावान्तान् अर्पयित्वा स्वविश्रान्त्या जप्त्वा उपसंहृत्य जले निक्षिपेत्। इति बाह्ययागः अथ शक्तौ, तत्र अन्योन्यं शक्तितालासावीराणाम्—उभयेषाम् उभयात्मकत्वेन प्रोल्लासप्रारम्भसृष्ट्यन्तशिवशक्तिप्रबाधे परस्परं व्या- पारात्, परमेशानितया च शुद्धरूपतया तत्र प्राधान्यम्, एतेन च विशिष्ट- चक्रस्यापि शक्तित्वं व्याख्यातम्, तत्र शिखाबन्धनव्याप्त्यैव पूजनं शक्ति- त्रयान्तमासनं कोणत्रये मध्ये विसर्गशक्तिः इति तु व्याप्तौ विशेषः। एवं स्वदेहे तत्रैव चक्रे ततो ब्रह्मरन्ध्राद्यनुचक्रेषु। अथ यामले शक्तेर्लक्षणमेतत् तद्द्बभेदस्ततोऽनपेक्ष्य वयः। जात्यादींश्चासङ्गात् लोकेतरयुगलजं हि तादात्म्यम्॥ कार्यहेतुसहोत्थत्वात्तैधं साक्षादथान्यथा। क्लृप्तान्नतो मिथोऽभ्यर्च्य तर्प्यानन्दान्तिान्तिकत्वतः॥ चक्रमर्च्चेत्तदौचित्यादनुचक्रं तथानुगम्। बहिः पुष्पादिनान्तश्च गन्धभुक्त्यासवादिभिः॥ एवमानन्दसन्दोहिततत्त्वचेष्टोच्छलत्स्थितिः। अनुचक्रगणश्चक्रतादात्म्यादभिलीयते॥ निजनिजभोगाभोगप्रविकासमयस्वरूपपरिमर्शो। क्रमशोऽनुचक्रदेव्यः संविच्चक्रं हि मध्यमं यान्ति॥
आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९३ अनुचक्रदेवतात्मकमरीचिगणपूरणाधिगतवीर्यम् । तच्छक्तितद्वदात्मकमन्योन्यसमुन्मुखं भवति ॥ तद्युगलमूर्ध्वधामप्रवेशसस्पन्दजातसंक्षोभम् । क्षुभ्नात्यनुचक्राण्यपि तानि तदा तन्मयानि न पृथक्तु ॥ इत्थं यामलमेतद् गलितभिदासंकथं यदैव तदा । क्रमतारतम्ययोगात् सैव हि संविद्विसर्गसंघट्टः ॥ तद्ध्रुवधामानुत्तरमुभयात्मकजगदुदारमानन्दम् । नो शान्तं नाप्युदितं शान्तोदितसूतिकारणं परं कौलम् ॥ अनवच्छिन्नपदेप्सुस्तां संविदमात्मसात्कुर्यात् । शान्तोदितात्मकद्वयमथ युगपदुदेति शक्तिशक्तिमतोः ॥ स्वात्मान्योन्यावेशात् शान्तान्यत्वे द्वयोर्द्वयात्मकत्वात् । शक्तिस्तु तद्वदुदितां सृष्टिं पुष्णाति नो तद्वान् ॥ तस्यां चार्यं कुलमथ तया नृषु प्रोक्तयोगसंघट्टात् । अथ सृष्टे द्वितीयेऽस्मिन् शान्तोदितधाम्नि येऽनुसंदधते ॥ प्राच्यां विसर्गसत्तामनवच्छिदिते पदे रूढा । उदितं च मिथो वक्त्रात् मुख्याद्वक्त्र प्रगृह्यते च बहिः ॥ तृप्तं देवीचक्रं सिद्धिज्ञानापवर्गदं भवति । शान्ताभ्यासे शान्तं शिवमेति यदत्र देवताचक्रम् ॥ शून्यं निरानन्दमयं निर्वृतिनिजधामतोऽर्घं च । रणरणकरसान्निजरसभरितबहिर्भावचर्वणरसेन ॥ आन्तरपूर्णसमुच्छलदनुचक्रं याति चक्रमथ तदापे । उच्छलति प्राग्वदिति त्रिविधोऽन्वर्थो विसर्गोऽयम् ॥ एतद्विसर्गधामनि परिमर्शनतस्त्रिधैव मनुवीर्यम् । तत्तत्संविद्गर्भे मन्त्रस्तत्तत्फलं सूते ॥
२०० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ कोणत्रयान्तराश्रितनित्योदितमङ्गलच्छदे कमले । नित्यावियुतं नालं षोडशदलकमलसन्मूलम् ॥ मध्यस्थनालगुम्फितसरोजयुगघट्टनक्रमादग्नौ । मध्यस्थपूर्णशशधरसुन्दरदिनकरकरौघसंघट्टात् ॥ त्रिदलारुणवीर्यकलासङ्गान्मध्येऽङ्कुरसृष्टिः । इति शशधरवासरपतिचित्रगुसङ्घट्टमुद्रया झटिति ॥ सृष्ट्यादिक्रममन्तःकुर्वंस्तुर्ये स्थितिं लभते । एतत्खेचरमुद्रावेशेऽन्योन्यं स्वशक्तिशक्तिमतोः ॥ पानोपभोगलीलाहासादिषु यो भवेद्विमर्शमयः । अव्यक्तध्वनिरावस्फोटश्रुतिनादनादान्तैः ॥ अव्युच्छिन्नानाहतपरमार्थैमन्त्रवीर्यं तत् । गमनागमविश्रान्तिषु कर्णे नयने द्विलक्षमसम्पर्के ॥ तत्संमीलनयोगे देहान्ताख्ये च यामले चक्रे । कुचमध्यहृदयदेशादोष्ठान्ते कण्ठगं यदव्यक्तम् ॥ तच्चक्रद्वयमध्यगमाकर्ण्य क्षोभविगमसमये यत् । निर्वान्ति तत्र चैवं योऽष्टविधो नादभैरवः परमः ॥ ज्योतिर्ध्वनिश्च यस्मात् सा मान्त्री व्याप्तिरुच्यते परमा । एवं कर्मणि कर्मणि विदुषः स्याज्जीवतो मुक्तिः । तज्ज्ञः शास्त्रे मुक्तः परकुलविज्ञानभाजनं गर्भः ॥ शून्याशून्यलयं कुर्यादेकदण्डेऽनलानिलौ । शूलं समरसीकृत्य रसे रसमिव स्थितम् ॥ त्यक्ताशङ्को निराचारो नाहमस्मीति भावयन् । देहस्था देवताः पश्यन् ह्लादोद्वेगादि चिद्धने ॥ कर्णाक्षिमूखनासादिचक्रस्थं देवतागणम् । ग्रहीतारं सदा पश्यन् खेचर्या सिध्यति ध्रुवम् ॥
आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०१ श्वभ्रे सुदूरे झटिति स्वदेहं संपातयन्त्वासमसाहसेन । आकुञ्च्य हस्तद्वितयं प्रपश्यन् मुद्रामिमां व्योमचरीं भजेत ॥ इत्येष यामलयागः । उक्तव्याप्तिके प्राणे विश्वमये प्रोक्तसंविदाप्त्या तर्पणास्रग्गन्धधूपादिसमर्पणेन उपोद्वलनं प्राणयागः । विश्रान्तिरूढिस्तु संविद्यागः प्रागेव निरूपितः एवम् एतेभ्यो यागेभ्योऽन्यतमं कृत्वा यदि तथाविधनिर्विचिकित्सतापवित्रितहृदयः शिष्यो भवति तदा तस्मै तद्याग- दर्शनपूर्वकं तिलाज्याहुतिपूर्वकनिरपेक्षमेव पूर्वोक्तव्याप्त्या अनुसंधान- क्रमेण अवलोकनया दीक्षां कुर्यात्, परोक्षदीक्षादिके नैमित्तिकान्ते तु पूर्व एव विधिः—केवलम् एतद्यागप्रधानतया इति । गुरुशरीरे सप्तमः कुल- यागः सर्वोत्तमः, सोऽपि प्राग्यागसाहित्येन सकृदेव कृतः सर्वं पूरयति इति शिवम् । बाहोरि सत्तिदेहिणि अदेह इज्झामलि पाणदुद्धिगुरुबोधइ । जो अणुसंविदि सन्धि अरोह इसो पर इक्कुललद्धणि सोहइ ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे कुलयागप्रकाशनं नाम द्वाविंशमाह्निकम् ॥ २२ ॥ इत्थं षडर्धक्रमसंप्रदायं सप्रत्ययाप्रत्ययभिन्नमाप्य । श्रीशम्भुनाथात्करणारसेन स्वयं प्रसन्नादनपेक्षवृत्त्या ॥ काश्मीरिकोऽभिनवगुप्तपदाभिधानः श्रीतन्त्रसारमकरोदृजुना क्रमेण । यत्तेन सर्वजन एष शिवं प्रयातु लोकोत्तरप्रसरशांभवतन्त्रसारम् ॥ कृतिस्तत्रभवच्छ्रीमन्महामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीमदभिनव- गुप्तापादानाम् ।
बाईसवाँ आह्निक जिनमें सम्यक्रूप से उस प्रकार वासना का उन्मेष हो चुका है और उसमें सुदृढ़ निष्ठा उत्पन्न हुआ है ऐसे अधिकारी जनों के लिए समग्र उपासना का रहस्य कौलिक प्रक्रिया से निरूपण किया जा रहा है। इस विषय में योगसंचार नामक ग्रन्थ में कहा गया है। ब्रह्म आनन्द स्वरूप है जो शरीर में स्थित है और वह तीन ओष्ठ वर्णों (पवर्ग) के अन्तिम में (मकार) स्थित है। जो ब्रह्मचारी नहीं है वह इसके त्याग से आनन्द से वर्जित होता है। आनन्द कृत्रिम आहार रूप है ऐसा समझकर जो चक्रयाग में प्रविष्ट होता है और उसे त्याग करते हुए चक्रयाग करता है इन दोनों स्थितियों में वे भीषण रौरव में पतित होते हैं। अतः इस विधि के अनुसार कुलयाग सम्पन्न होता है। यह याग छः प्रकार हैं, जैसे बाह्य स्थल में, शक्ति में, निज शरीर में, यामल में, प्राण में और संवित् में। इनमें उत्तर-उत्तर उत्कृष्ट हैं अर्थात् प्राण से संवित् उत्कृष्ट है, और पूर्व-पूर्व अपनी रुचि के अनुसार ग्रहण करने योग्य है। जो सिद्धि के अभिलाषी है उससे द्वितीय (शक्ति), चतुर्थ (यामल) और पंचम (प्राण) सब प्रकार से ग्रहणयोग्य हैं। जो षष्ठ (संविद् रूप) है मुमुक्षु के लिए वही मुख्य साधन है, लेकिन उसके लिए द्वितीय आदि साधन नैमित्तिक पर्व में अवश्य अनुष्ठेय है, क्योंकि उसीसे विधियों की पूर्ति होती है। इनमें जो बाह्ययाग है उसमें स्थण्डिल, आसव से पूर्ण वीरपात्र, रक्तवर्ण वस्त्र, पहले उल्लिखित लिंग भी है। इस कार्य में स्नान आदि कर्तव्यों की अपेक्षा के बिना परिपूर्ण आनन्दस्वरूप में विश्रान्ति के द्वारा ही अपनी विशुद्धि सम्पन्न करने के बाद पहले अपने प्राण, संवित् और शरीर की तदात्मता (एकरूपता) के चिन्तन के अनन्तर संवित् जो परमशिव स्वरूप से अभिन्न है इसलिए सत्ताईस बार मन्त्र के उच्चारण के अनन्तर अपनी मूर्धा (मस्तक), मुख, हृदय, गुह्यदेश और मूर्तियों में अनुलोम और विलोम क्रम से न्यास के द्वारा विश्वात्मक अध्वाओं को
आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०३ परिपूर्णता आती है। परमेश्वर के अपर, परापर और पर स्वरूप में इस प्रकार भावना का उपयोग है । माया, पुरुष, प्रकृति, गुण और बुद्धि से पृथिवी तक सत्ताईस तत्त्व हैं । कला आदि इन्हीं में अन्तर्भूत हैं ( ये परमेश्वर का अपर रूप है )। विद्याशक्ति में भी परापरत्व वर्तमान है क्योंकि ब्रह्मपञ्चक ( ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ) सद्योजातत्व भवतत्त्व उद्भवत्व आदि धर्मों के सत्ताईस स्वरूप हैं—ऐसा श्रो मल्लकुलेश नाम के आचार्य ने बताया है। परस्वरूप में भी परमेश्वर पंचशक्ति सम्पन्न हैं, फिर प्रत्येक शक्ति के पांच रूप हैं—अतः शक्ति पच्चीस हैं। ये शक्तियाँ जब एक दूसरे से भिन्नता न रखकर ( अनुद्भिन्नविभागा ) प्रकाशमान है तब वह शक्ति एक है, और जब विभाग पूर्णरूप से प्रकट नहीं तब शक्ति एक है। इस प्रकार शक्ति की सप्तविंशतिरूप की व्याप्ति के द्वारा संवित् रूपी अग्नि की शिखा को जो बुद्धि और प्राण स्वरूप है एकबार के उच्चारण से बाँधना चाहिए ताकि शिखा के बाँधने से परमशिव ही प्रतिबद्ध हो गये हैं और उनसे भिन्न कुछ भी प्रतीत न हो रहा है। इसके अनन्तर परमेश्वर द्वारा अनुप्राणित बुद्धि के द्वारा अधिष्ठित करणचक्र ( इन्द्रियाँ ) अनुविद्ध हैं और उसके द्वारा ( करणचक्र ) सम्मुख में स्थित याग के द्रव्य, गृह और दिशाएँ और उनके आधाररूपी सभी वस्तुओं को भी तद्रूप में परिवर्तित ( रूपान्तरित ) करना चाहिए । इसके अनन्तर अर्घपात्र को भी शिखाबन्ध रूप व्याप्ति के द्वारा पूर्ण करना और पूजन करना चाहिए। अर्घपात्र से कुछ बूँद से स्थण्डिल का पूजन, उस अर्घपात्र में स्थित रस ( आसव ) से वाम अनामा और अंगुष्ठ से संयोग से देह चक्रोंमें मंत्रचक्र का पूजन और तर्पण करना चाहिए। इसके अनन्तर आभ्यन्तरोण प्राण में भी मन्त्रचक्र का पूजन और तर्पण होना आवश्यक है। इसके बाद स्थण्डिल में व्यापिनी, समना और उन्मना रूपी जो तीन शक्तियाँ हैं वे त्रिशूल के तीन अराएँ हैं इस प्रकार शक्ति-त्रयात्मक आसन की कल्पना करनी चाहिए। माया के अन्त तक जो तत्त्व समूह हैं वे औकार सहित सकार रूपी वर्ण में विश्रान्त हैं—इस प्रकार आसन की कल्पना तीन शक्तियों के अन्त तक व्याप्त है ऐसी होनी चाहिए। माया का विस्तार सकार तक और औकार का विस्तार तीन
२०४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ शक्तियों के अन्त तक भावना करनी है और सब के ऊपर विमर्शरूपी शक्ति का यजन करना है । इस प्रकार एक बार मन्त्र के उच्चार के द्वारा आधार और आधेय के न्यास के अनन्तर उसी में अर्थात् उसी आसन में आधेय रूपो संवित् में विश्व को देखना चाहिए । तब प्रतीत होता है विश्व भी चैतन्य स्वरूप है । इस उपाय से विश्व संवित् के द्वारा और संवित् विश्व के द्वारा संपुटित हो जाते हैं। क्योंकि विश्व का उदय संवित् से और विश्व को पर्यवसानभूमि भी संवित् ही है। वेद्य वस्तु से संवित् का उदय होता है और संवित् में ही वेद्य वस्तु का विश्राम है। इस प्रकार जो संवित् का स्वरूप है उस स्वरूप का साक्षात्कार दो संपुटनों से होता है। इसलिए कहा गया है— सृष्टि को तो संपुटन करते हुए इत्यादि । इसके अनन्तर गन्ध, कुसुम,धूप, आसव आदि के अर्पण के बाद अपने स्वरूप निमज्जन तक कार्य समाप्त कर आत्म-विश्राम रूपी जप करने के अनन्तर सब के उपसंहार के बाद उसे ( स्थण्डिल को ) जल में निक्षेप करना चाहिए । यह हुआ बाह्ययाग इसके अनन्तर शक्ति के सम्बन्ध में कुलयाग की विधि का निरूपण हो रहा है। इस विषय में उल्लेख्य यह है कि शक्ति और वीरों के परस्पर उभयस्वरूप की प्राप्ति के लिए अर्थात् वीरों को शक्तिरूप में शक्ति को वीर के रूप में रूपान्तरण आवश्यक है, क्योंकि दोनों में उभयात्मकता वर्तमान हैं। अतः इन दोनों में प्रोल्लास ( शक्तिरूपता का ), प्रारम्भ और सृष्टि तक क्रम के द्वारा दोनों में शिवभाव और शक्तिभाव का प्रबोधन आव- श्यक है। इस कार्य में दोनों का ही व्यापार है। परमेश्वर को नियति- शक्ति के द्वारा शुद्धरूप की प्रधानता अंगीकृत है। इस व्याख्यान के अनुसार जो विशिष्टचक्र है उसे शक्ति कहना ही उचित है। उस चक्र में शिखाबन्ध की व्याप्ति के द्वारा पूजन, शक्तित्रयात्मक आसन उस चक्र के तीन कोणों पर और उसके मध्य में विसर्गशक्ति स्थित है—ऐसी भावना आवश्यक है। इस प्रकार व्याप्ति के विचार में यही विशेष है। इसी क्रम से अपने शरीर में और उसमें स्थित चक्र में और इसके अनन्तर ब्रह्म-
आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०५ रन्ध्र से लेकर अन्य अनुचक्र चक्षु आदि इन्द्रियों आदि में व्याप्ति का चिन्तन आवश्यक है । अब यामल (शिवशक्तियुगल) के विषय में विधि का निरूपण हो रहा है— जिससे तदात्मता आने पर ही अद्वयभाव की प्रतिष्ठा होती है शक्ति का लक्षण वही है । अतः वयः तथा जाति आदि की अपेक्षा न रखकर लौकिक तथा उससे भिन्न अलौकिक तथा ज्ञानीय सम्बन्ध से सम्बन्धित शक्ति से तदात्मता प्राप्ति होती है । कार्य, हेतु और सहोत्थ साक्षात्रूप से शक्तियाँ तीन प्रकार हैं । अवान्तर विभाग से ये अन्य प्रकार से कल्पित हुए हैं। अतः शक्तियों की अर्चना और तर्पण शक्तिमान् के साथ होना आवश्यक है, क्योंकि आनन्द उसी क्रम से सन्निकट होता है । चक्र की अर्चना विधि के अनुसार होनी चाहिए । इसके अनन्तर अनुचक्रों की और इसके पश्चात् उन चक्रों के साथ चलने वाले अन्य चक्रों की अर्चना आवश्यक है। बाहर पुष्प आदि से और अन्दर गन्ध, भोजन- द्रव्य और आसवों से तर्पण आवश्यक है । इस क्रम से तर्पण के अनन्तर आनन्द के सन्दोह के लिए परस्पर की चेष्टा से जिस उच्छलन की स्थिति उत्पन्न होती है उससे अनुचक्रों के समूह मुख्यचक्र के साथ तल्लीन होकर उससे तदात्मता प्राप्त करते हैं । अपने-अपने भोग के चमत्कार से बाहर की ओर इन्द्रियों का जो उच्छलन उत्पन्न होता है उससे अपने प्रमातृ स्वरूप का परामर्श होने पर दृगादि अनुचक्र देवीगण क्रमशः संतृप्त होकर सब संवित् के विश्राम भूमि का जो मध्यम भूमि है उस परमानन्दमय प्रमातृ-स्वरूप संवित्- चक्र के साथ तदात्मता प्राप्त करती हैं । अनुचक्ररूपी देवताओं की जो रश्मियां हैं उनकी पूर्णता से शक्ति और शक्तिमान् दोनों को वीर्य प्राप्त होता है जिससे उभय ही पारस्परिक भेद को त्याग करते हुए संघट्ट (सामरस्य) को प्राप्त करते हैं । संघट्ट के अवसर पर उभय के ऊर्ध्वधाम की ओर जो यात्रा है उसमें प्रवेश और स्पन्दन से उत्पन्न संक्षोभ से अनुचक्रगण भी क्षुब्ध होते हैं ।
२०६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ वे भी उस समय उन उभय के साथ तन्मय हो जाते हैं, उनसे पृथक् नहीं रहते हैं। इस क्रम से ज्योंही सब प्रकार भेद के लेशरहित यामलभाव की प्राप्ति होती है उसी समय क्रम के तारतम्य के अनुसार संवित्परामर्शमय संघट्ट का उदय है। वही ध्रुवधाम अनुत्तरपद है जो शक्ति-शक्तिमान उभयात्मक है। इसे ही उदार जगदानन्द कहते हैं। वह न तो शान्त न उदित स्थिति है, अपितु शान्तोदित स्वरूप का कारण परम कौल है जो अनवच्छिन्न संवित्मात्रसार है। अवच्छेदरहित यही स्थिति परम प्राप्य है। उसके जो अभिलाषी है उसे इस संवित् स्वरूप को सदैव आत्मसात् करना चाहिए। शक्ति और शक्तिमान के शान्त ( विश्वोत्तीर्ण ), उदित ( विश्वात्मक ) और अधिक क्या शान्तोदित भी एक साथ ( युगपत् ) उदित होते हैं। स्वात्मस्वरूप उभय के साथ उभय के आवेश के कारण दोनों ही शान्त और उदित स्वरूप हैं, क्यों कि उभय ही उभयात्मक है। लेकिन शक्ति ही विश्वात्मक ( उदित ) सृष्टि को अपने गर्भ में धारण करती है, शक्तिमान् नहीं करता है। अतः शक्ति के मुख से ज्ञानसंक्रमण आचार्य के द्वारा मनुष्यों में होना चाहिए (?) इसलिए शान्त और उदित धामात्मक विसर्ग को जो दोनों प्रकार स्थितियों का स्वरूप है उसका अनुसन्धान ( अर्थात् इन अवस्थाद्वय के कारणभूत संघट्टमय विसर्गात्मक स्थिति का अनुसन्धान ) जो लोग करते हैं वे अनवच्छिन्न पूर्ण स्थिति में विश्राम प्राप्त करते हैं। उभय के संघट्ट से उत्पन्न द्रव्य को मुख्य वक्त्र से संगृहीत कर बाहर भी उसे अपने प्रयोग में लावे। देवीचक्र के तर्पित होने पर वह सिद्धि, ज्ञान और मोक्ष देनेवाला होता है। शान्तात्मक बिसर्ग के अनुसन्धान से अर्थात् शान्तस्वरूप विसर्ग का अभ्यास होने पर शान्त शिवभाव प्राप्त होता है और सभी देवताचक्र भी शान्तस्वरूप प्राप्त करता है। उस समय सब भावों का संहरण के कारण परमशून्यावस्था का उदय होता है जो निरानन्दमय स्थिति है, तब वृत्तियाँ उपरत हो जाती हैं उस समय अपने स्वरूप की भासना का भी अभाव रहता है (?)
आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०७ करण समूह के रश्मिगण विषयों के प्रति आसक्ति के कारण विषयों के ग्रहण करने के अनन्तर, उन्हें संविन्मय बनाकर अपने स्वरूप के रस से आस्वादित करते हुए अपने विश्रान्तिधाम आत्मस्वरूप में अर्पित करते हैं। सर्वतोभाव से परिपूर्ण हो जाने पर ( भीतरी पूर्णता आ जाने पर ) अनुचक्रगण ( इन्द्रिय समूह ) समुच्छलित होकर फिर बहिर्मुख होते हैं। और मुख्यचक्र भी पूर्ववत् उच्छलित होता है। अतः यह विसर्ग तीन प्रकार हैं—जो ठीक ही है। ( जहाँ से सर्जन होता है, जहाँ से विचित्र सर्ग का उदय तथा जहाँ सब विगलित होते हैं—विसर्ग के ये तीन स्वरूप हैं )। इस विसर्गधाम में तीन प्रकार से सतत मन्त्रों का परिमर्शन होने पर मन्त्रों का यथार्थ वीर्य अधिगत होता है। मन्त्रचैतन्य के आधार में मन्त्र भावित होने पर भिन्न-भिन्न फलों का प्रसव करता है। तीन कोणों के अन्तराल में जो नित्य उन्मुख ( सदा विकसित ) ( मण्डलच्छद ) मण्डल को आच्छादित करनेवाला त्रिदल कमल है उससे नित्य संबद्ध ( उससे बराबर सम्बन्ध रखनेवाला ) जो षोडश दल कमल है उसका मूल उस कमल तक व्याप्त है। ये दोनों कमलों का मध्यभाग नाल से सज्जित ( गुम्फित ) है। मध्यभाग में स्थित इस मध्यनाल रूपी नाल से शोभित दोनों कमलों के क्रमिक घट्टन ( संघर्ष ) से उनके मध्य में स्थित परिपूर्ण चन्द्रमा के समान सौन्दर्यशाली, ( यह आनन्दमय है इसलिए सुन्दर है ) और रवि के किरण के समान उज्ज्वल इन दोनों कलाओं ( चन्द्र और सूर्य की कलायें ) के संघर्ष से चित्कला का प्रसर रूपी अंकुर की सृष्टि होती है जो त्रिदल कमल की कला अरुण ( रक्त ) वर्ण रजोलूप और रेतसरूप ( वीर्यरूप ) है। अतः चन्द्र, सूर्य और अग्नि आत्मक संघट्टरूप मुद्रा ( जिसे षडर मुद्रा कहते हैं ) के द्वारा सृष्टि आदि क्रम को ( सृष्टि, स्थिति और संहार ) हृदय में धारण करने पर तुरीयस्थिति ( अनाख्या ) प्राप्त होता है। इस खचरमुद्रा शक्ति और शक्तिमान् के परस्पर आवेश में आ जाने
२०८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ पर अर्थात् दोनों में सामरस्य भाव की स्थिति उत्पन्न होने पर उनके द्वारा उपयोग होनेवाले जो-जो वस्तुएँ हैं जैसे पानीय, उपभोग, लीला, हास्य आदि कार्य भी जिससे जो विमर्शमय स्थिति की उत्पत्ति होती है वह वास्तव में अव्यक्त ध्वनि, राव, स्फोट, श्रुति, नाद और नादान्त आदि स्वरूपों को धारण करते हुए अविच्छिन्न अनाहत परमार्थ स्वरूप होकर मंत्र का वीर्यात्मक बनता है । प्राण और अपान के गमन और आगमनों के विश्राम-भूमियों में, ( बुद्धि के भी ), और कानों से शब्द सुनते समय, नयनों से दृश्यों के दर्शन के अवसर पर, दोनों को यौन अंग के स्पर्श मात्र से, संघट्ट के समय, शरीर के उभय द्वादशान्तों में और यामल चक्र में स्थित होकर जप करना चाहिए । शक्ति का कुचमध्य जो हृदयस्थान है वहाँ से चलनेवाली ओष्ठ के अन्त तक कण्ठस्थल में स्थित जो अव्यक्त ध्वनि उठती है वह पूर्वोक्त चक्रद्वय के मध्यम तक जानेवाली है उसे संघट्ट के उपरम के समय सुनना है । उसी चक्र में सभी विश्रान्ति प्राप्त करते हैं । अव्यक्त आदि रूपों को धारण करते हुए परमोत्कृष्ट अष्टविध नादभैरव वहाँ उल्लसित होते हैं । ज्योति, अर्धचन्द्र, नाद, शक्ति आदि भी का उदय वहाँ से है— इसी प्रकार से परमा मान्त्री व्याप्ति का स्वरूप बतलाया जाता है । इस प्रकार सब कर्मों में व्याप्ति का स्मरण विद्वानों के द्वारा होने पर जीवित दशा में मुक्ति मिलती है । इसके ज्ञाता भी शास्त्र में मुक्त है और मेलक के अवसर पर जो जीव गर्भ में स्थित रहता है वह परम कौलिक विज्ञान का ज्ञाता बन जाता है । शून्य और अशून्य का लय स्थान जो एक दण्ड रूप मध्यममार्ग है, उसमें अनल और अनिल ( प्राण और अपान ) का लय त्रिशूल में समरसित इस प्रकारसे करना है जैसे रस में रस स्थित रहता है । शंकाविहीन होकर, किसी आचार से बद्ध न रहकर 'मैं न हूँ, इस प्रकार भावना के साथ देह स्थित देवताओं को दर्शन करते हुए ह्लाद और उद्वेग आदि को चिद्घन स्वरूप में अर्पित करना चाहिए ।
आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०९ उस प्रकार व्याप्तिविशिष्ट विश्वमय प्राण में पूर्वोक्त संवित्-व्याप्ति के द्वारा तर्पण, अन्न, गन्ध, धूप आदि वस्तुओं के समर्पण से उसकी दृढ़ता सम्पादन करना ही प्राणयाग है। उस विषय में सुदृढ़ निष्ठा होने पर वही संवित्-याग का रूप धारण करता है—इसकी चर्चा पहले ही की गयी है। अतः इन यागों में किसी एक के सम्पादन के बाद यदि कोई शिष्य सन्देह- रहित होकर शुद्ध हृदय बन जाय तो उसे उस याग का दर्शन करा कर तिल, घृत तथा हवन आदि की अपेक्षा के बिना ही पूर्वोक्त व्याप्ति के अनुसन्धान से केवल दृष्टि के द्वारा उसे दीक्षा देनी चाहिए। परोक्ष दीक्षा प्रभृति में जिसका पर्यवसान नैमित्तिक कृत्य तक है, उस विषय में पूर्वोक्त विधि अवलम्बनीय है, लेकिन इस याग की मुख्यता के कारण यह केवल इतना ही है। गुरु के शरीर में जो सप्तम कुलयाग सम्पन्न होता है वह सबसे उत्तम है, वह भी पूर्वोक्त याग के साथ एकबार सम्पन्न होने पर सब की पूर्णता आती है। इति शिवम् इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य के द्वारा रचित तन्त्रसार के कुलयाग- प्रकाशन १ नाम का बाईसवाँ आह्निक है। १. इस आह्निक में कुलयागविधि का संक्षिप्त विवरण उपस्थित किया गया हैं। कौलिक क्रम के विषय में शिक्षित जनों में स्वाभाविक अनीहा है, क्योंकि इस क्रम में ऐसे कुछ आचारों का अनुष्ठान अवश्य करणीय हैं जो सुरुचिसम्पन्न मनुष्यों के विचार में सुष्ठु प्रतीत नहीं होता है। लेकिन इस प्रसंग में यह स्मरणीय हैं यह क्रम सर्वसाधारण के लिए नहीं अपितु जिन्होंने साधनसम्पत्ति की पराकाष्ठा प्राप्त की है और विकल्पहीन स्थिति अपनायी हैं उन 'धाराधिरूढ़' मनुष्यों के लिए ही यह मार्ग है, अन्य के लिए नहीं। अन्य प्रक्रिया से कुलप्रक्रिया विलक्षण भी है, क्योंकि यह सिद्धों की परंपरा से प्राप्त क्रम है, अतः इस क्रम में चलने वाले स्वल्प समय में जो कुछ प्राप्त करते हैं इससे भिन्न अन्य क्रम से चलने वाले नाना प्रकार मन्त्र समूहों के अनुष्ठान के द्वारा सहस्र वर्षों में उसे प्राप्त नहीं कर सकते। सिद्धान्त आदि तंत्रों में जिन मंत्रों का उल्लेख है, वे सब वीर्यहीन हैं क्योंकि वे शक्तितैज से वर्जित हैं, परन्तु सभी कौलिक मंत्र स्वभाव से ही दीप्त तेजोमय हैं और सद्य ही प्रत्यय उत्पन्न करने वाले हैं।