भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०५ रन्ध्र से लेकर अन्य अनुचक्र चक्षु आदि इन्द्रियों आदि में व्याप्ति का चिन्तन आवश्यक है । अब यामल (शिवशक्तियुगल) के विषय में विधि का निरूपण हो रहा है— जिससे तदात्मता आने पर ही अद्वयभाव की प्रतिष्ठा होती है शक्ति का लक्षण वही है । अतः वयः तथा जाति आदि की अपेक्षा न रखकर लौकिक तथा उससे भिन्न अलौकिक तथा ज्ञानीय सम्बन्ध से सम्बन्धित शक्ति से तदात्मता प्राप्ति होती है । कार्य, हेतु और सहोत्थ साक्षात्रूप से शक्तियाँ तीन प्रकार हैं । अवान्तर विभाग से ये अन्य प्रकार से कल्पित हुए हैं। अतः शक्तियों की अर्चना और तर्पण शक्तिमान् के साथ होना आवश्यक है, क्योंकि आनन्द उसी क्रम से सन्निकट होता है । चक्र की अर्चना विधि के अनुसार होनी चाहिए । इसके अनन्तर अनुचक्रों की और इसके पश्चात् उन चक्रों के साथ चलने वाले अन्य चक्रों की अर्चना आवश्यक है। बाहर पुष्प आदि से और अन्दर गन्ध, भोजन- द्रव्य और आसवों से तर्पण आवश्यक है । इस क्रम से तर्पण के अनन्तर आनन्द के सन्दोह के लिए परस्पर की चेष्टा से जिस उच्छलन की स्थिति उत्पन्न होती है उससे अनुचक्रों के समूह मुख्यचक्र के साथ तल्लीन होकर उससे तदात्मता प्राप्त करते हैं । अपने-अपने भोग के चमत्कार से बाहर की ओर इन्द्रियों का जो उच्छलन उत्पन्न होता है उससे अपने प्रमातृ स्वरूप का परामर्श होने पर दृगादि अनुचक्र देवीगण क्रमशः संतृप्त होकर सब संवित् के विश्राम भूमि का जो मध्यम भूमि है उस परमानन्दमय प्रमातृ-स्वरूप संवित्- चक्र के साथ तदात्मता प्राप्त करती हैं । अनुचक्ररूपी देवताओं की जो रश्मियां हैं उनकी पूर्णता से शक्ति और शक्तिमान् दोनों को वीर्य प्राप्त होता है जिससे उभय ही पारस्परिक भेद को त्याग करते हुए संघट्ट (सामरस्य) को प्राप्त करते हैं । संघट्ट के अवसर पर उभय के ऊर्ध्वधाम की ओर जो यात्रा है उसमें प्रवेश और स्पन्दन से उत्पन्न संक्षोभ से अनुचक्रगण भी क्षुब्ध होते हैं ।