तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ शक्तियों के अन्त तक भावना करनी है और सब के ऊपर विमर्शरूपी शक्ति का यजन करना है । इस प्रकार एक बार मन्त्र के उच्चार के द्वारा आधार और आधेय के न्यास के अनन्तर उसी में अर्थात् उसी आसन में आधेय रूपो संवित् में विश्व को देखना चाहिए । तब प्रतीत होता है विश्व भी चैतन्य स्वरूप है । इस उपाय से विश्व संवित् के द्वारा और संवित् विश्व के द्वारा संपुटित हो जाते हैं। क्योंकि विश्व का उदय संवित् से और विश्व को पर्यवसानभूमि भी संवित् ही है। वेद्य वस्तु से संवित् का उदय होता है और संवित् में ही वेद्य वस्तु का विश्राम है। इस प्रकार जो संवित् का स्वरूप है उस स्वरूप का साक्षात्कार दो संपुटनों से होता है। इसलिए कहा गया है— सृष्टि को तो संपुटन करते हुए इत्यादि । इसके अनन्तर गन्ध, कुसुम,धूप, आसव आदि के अर्पण के बाद अपने स्वरूप निमज्जन तक कार्य समाप्त कर आत्म-विश्राम रूपी जप करने के अनन्तर सब के उपसंहार के बाद उसे ( स्थण्डिल को ) जल में निक्षेप करना चाहिए । यह हुआ बाह्ययाग इसके अनन्तर शक्ति के सम्बन्ध में कुलयाग की विधि का निरूपण हो रहा है। इस विषय में उल्लेख्य यह है कि शक्ति और वीरों के परस्पर उभयस्वरूप की प्राप्ति के लिए अर्थात् वीरों को शक्तिरूप में शक्ति को वीर के रूप में रूपान्तरण आवश्यक है, क्योंकि दोनों में उभयात्मकता वर्तमान हैं। अतः इन दोनों में प्रोल्लास ( शक्तिरूपता का ), प्रारम्भ और सृष्टि तक क्रम के द्वारा दोनों में शिवभाव और शक्तिभाव का प्रबोधन आव- श्यक है। इस कार्य में दोनों का ही व्यापार है। परमेश्वर को नियति- शक्ति के द्वारा शुद्धरूप की प्रधानता अंगीकृत है। इस व्याख्यान के अनुसार जो विशिष्टचक्र है उसे शक्ति कहना ही उचित है। उस चक्र में शिखाबन्ध की व्याप्ति के द्वारा पूजन, शक्तित्रयात्मक आसन उस चक्र के तीन कोणों पर और उसके मध्य में विसर्गशक्ति स्थित है—ऐसी भावना आवश्यक है। इस प्रकार व्याप्ति के विचार में यही विशेष है। इसी क्रम से अपने शरीर में और उसमें स्थित चक्र में और इसके अनन्तर ब्रह्म-