भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०३ परिपूर्णता आती है। परमेश्वर के अपर, परापर और पर स्वरूप में इस प्रकार भावना का उपयोग है । माया, पुरुष, प्रकृति, गुण और बुद्धि से पृथिवी तक सत्ताईस तत्त्व हैं । कला आदि इन्हीं में अन्तर्भूत हैं ( ये परमेश्वर का अपर रूप है )। विद्याशक्ति में भी परापरत्व वर्तमान है क्योंकि ब्रह्मपञ्चक ( ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ) सद्योजातत्व भवतत्त्व उद्भवत्व आदि धर्मों के सत्ताईस स्वरूप हैं—ऐसा श्रो मल्लकुलेश नाम के आचार्य ने बताया है। परस्वरूप में भी परमेश्वर पंचशक्ति सम्पन्न हैं, फिर प्रत्येक शक्ति के पांच रूप हैं—अतः शक्ति पच्चीस हैं। ये शक्तियाँ जब एक दूसरे से भिन्नता न रखकर ( अनुद्भिन्नविभागा ) प्रकाशमान है तब वह शक्ति एक है, और जब विभाग पूर्णरूप से प्रकट नहीं तब शक्ति एक है। इस प्रकार शक्ति की सप्तविंशतिरूप की व्याप्ति के द्वारा संवित् रूपी अग्नि की शिखा को जो बुद्धि और प्राण स्वरूप है एकबार के उच्चारण से बाँधना चाहिए ताकि शिखा के बाँधने से परमशिव ही प्रतिबद्ध हो गये हैं और उनसे भिन्न कुछ भी प्रतीत न हो रहा है। इसके अनन्तर परमेश्वर द्वारा अनुप्राणित बुद्धि के द्वारा अधिष्ठित करणचक्र ( इन्द्रियाँ ) अनुविद्ध हैं और उसके द्वारा ( करणचक्र ) सम्मुख में स्थित याग के द्रव्य, गृह और दिशाएँ और उनके आधाररूपी सभी वस्तुओं को भी तद्रूप में परिवर्तित ( रूपान्तरित ) करना चाहिए । इसके अनन्तर अर्घपात्र को भी शिखाबन्ध रूप व्याप्ति के द्वारा पूर्ण करना और पूजन करना चाहिए। अर्घपात्र से कुछ बूँद से स्थण्डिल का पूजन, उस अर्घपात्र में स्थित रस ( आसव ) से वाम अनामा और अंगुष्ठ से संयोग से देह चक्रोंमें मंत्रचक्र का पूजन और तर्पण करना चाहिए। इसके अनन्तर आभ्यन्तरोण प्राण में भी मन्त्रचक्र का पूजन और तर्पण होना आवश्यक है। इसके बाद स्थण्डिल में व्यापिनी, समना और उन्मना रूपी जो तीन शक्तियाँ हैं वे त्रिशूल के तीन अराएँ हैं इस प्रकार शक्ति-त्रयात्मक आसन की कल्पना करनी चाहिए। माया के अन्त तक जो तत्त्व समूह हैं वे औकार सहित सकार रूपी वर्ण में विश्रान्त हैं—इस प्रकार आसन की कल्पना तीन शक्तियों के अन्त तक व्याप्त है ऐसी होनी चाहिए। माया का विस्तार सकार तक और औकार का विस्तार तीन