तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ आह्निक जिनमें सम्यक्रूप से उस प्रकार वासना का उन्मेष हो चुका है और उसमें सुदृढ़ निष्ठा उत्पन्न हुआ है ऐसे अधिकारी जनों के लिए समग्र उपासना का रहस्य कौलिक प्रक्रिया से निरूपण किया जा रहा है। इस विषय में योगसंचार नामक ग्रन्थ में कहा गया है। ब्रह्म आनन्द स्वरूप है जो शरीर में स्थित है और वह तीन ओष्ठ वर्णों (पवर्ग) के अन्तिम में (मकार) स्थित है। जो ब्रह्मचारी नहीं है वह इसके त्याग से आनन्द से वर्जित होता है। आनन्द कृत्रिम आहार रूप है ऐसा समझकर जो चक्रयाग में प्रविष्ट होता है और उसे त्याग करते हुए चक्रयाग करता है इन दोनों स्थितियों में वे भीषण रौरव में पतित होते हैं। अतः इस विधि के अनुसार कुलयाग सम्पन्न होता है। यह याग छः प्रकार हैं, जैसे बाह्य स्थल में, शक्ति में, निज शरीर में, यामल में, प्राण में और संवित् में। इनमें उत्तर-उत्तर उत्कृष्ट हैं अर्थात् प्राण से संवित् उत्कृष्ट है, और पूर्व-पूर्व अपनी रुचि के अनुसार ग्रहण करने योग्य है। जो सिद्धि के अभिलाषी है उससे द्वितीय (शक्ति), चतुर्थ (यामल) और पंचम (प्राण) सब प्रकार से ग्रहणयोग्य हैं। जो षष्ठ (संविद् रूप) है मुमुक्षु के लिए वही मुख्य साधन है, लेकिन उसके लिए द्वितीय आदि साधन नैमित्तिक पर्व में अवश्य अनुष्ठेय है, क्योंकि उसीसे विधियों की पूर्ति होती है। इनमें जो बाह्ययाग है उसमें स्थण्डिल, आसव से पूर्ण वीरपात्र, रक्तवर्ण वस्त्र, पहले उल्लिखित लिंग भी है। इस कार्य में स्नान आदि कर्तव्यों की अपेक्षा के बिना परिपूर्ण आनन्दस्वरूप में विश्रान्ति के द्वारा ही अपनी विशुद्धि सम्पन्न करने के बाद पहले अपने प्राण, संवित् और शरीर की तदात्मता (एकरूपता) के चिन्तन के अनन्तर संवित् जो परमशिव स्वरूप से अभिन्न है इसलिए सत्ताईस बार मन्त्र के उच्चारण के अनन्तर अपनी मूर्धा (मस्तक), मुख, हृदय, गुह्यदेश और मूर्तियों में अनुलोम और विलोम क्रम से न्यास के द्वारा विश्वात्मक अध्वाओं को