भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 294 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287

२०६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ वे भी उस समय उन उभय के साथ तन्मय हो जाते हैं, उनसे पृथक् नहीं रहते हैं। इस क्रम से ज्योंही सब प्रकार भेद के लेशरहित यामलभाव की प्राप्ति होती है उसी समय क्रम के तारतम्य के अनुसार संवित्परामर्शमय संघट्ट का उदय है। वही ध्रुवधाम अनुत्तरपद है जो शक्ति-शक्तिमान उभयात्मक है। इसे ही उदार जगदानन्द कहते हैं। वह न तो शान्त न उदित स्थिति है, अपितु शान्तोदित स्वरूप का कारण परम कौल है जो अनवच्छिन्न संवित्मात्रसार है। अवच्छेदरहित यही स्थिति परम प्राप्य है। उसके जो अभिलाषी है उसे इस संवित् स्वरूप को सदैव आत्मसात् करना चाहिए। शक्ति और शक्तिमान के शान्त ( विश्वोत्तीर्ण ), उदित ( विश्वात्मक ) और अधिक क्या शान्तोदित भी एक साथ ( युगपत् ) उदित होते हैं। स्वात्मस्वरूप उभय के साथ उभय के आवेश के कारण दोनों ही शान्त और उदित स्वरूप हैं, क्यों कि उभय ही उभयात्मक है। लेकिन शक्ति ही विश्वात्मक ( उदित ) सृष्टि को अपने गर्भ में धारण करती है, शक्तिमान् नहीं करता है। अतः शक्ति के मुख से ज्ञानसंक्रमण आचार्य के द्वारा मनुष्यों में होना चाहिए (?) इसलिए शान्त और उदित धामात्मक विसर्ग को जो दोनों प्रकार स्थितियों का स्वरूप है उसका अनुसन्धान ( अर्थात् इन अवस्थाद्वय के कारणभूत संघट्टमय विसर्गात्मक स्थिति का अनुसन्धान ) जो लोग करते हैं वे अनवच्छिन्न पूर्ण स्थिति में विश्राम प्राप्त करते हैं। उभय के संघट्ट से उत्पन्न द्रव्य को मुख्य वक्त्र से संगृहीत कर बाहर भी उसे अपने प्रयोग में लावे। देवीचक्र के तर्पित होने पर वह सिद्धि, ज्ञान और मोक्ष देनेवाला होता है। शान्तात्मक बिसर्ग के अनुसन्धान से अर्थात् शान्तस्वरूप विसर्ग का अभ्यास होने पर शान्त शिवभाव प्राप्त होता है और सभी देवताचक्र भी शान्तस्वरूप प्राप्त करता है। उस समय सब भावों का संहरण के कारण परमशून्यावस्था का उदय होता है जो निरानन्दमय स्थिति है, तब वृत्तियाँ उपरत हो जाती हैं उस समय अपने स्वरूप की भासना का भी अभाव रहता है (?)