भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

आ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०७ करण समूह के रश्मिगण विषयों के प्रति आसक्ति के कारण विषयों के ग्रहण करने के अनन्तर, उन्हें संविन्मय बनाकर अपने स्वरूप के रस से आस्वादित करते हुए अपने विश्रान्तिधाम आत्मस्वरूप में अर्पित करते हैं। सर्वतोभाव से परिपूर्ण हो जाने पर ( भीतरी पूर्णता आ जाने पर ) अनुचक्रगण ( इन्द्रिय समूह ) समुच्छलित होकर फिर बहिर्मुख होते हैं। और मुख्यचक्र भी पूर्ववत् उच्छलित होता है। अतः यह विसर्ग तीन प्रकार हैं—जो ठीक ही है। ( जहाँ से सर्जन होता है, जहाँ से विचित्र सर्ग का उदय तथा जहाँ सब विगलित होते हैं—विसर्ग के ये तीन स्वरूप हैं )। इस विसर्गधाम में तीन प्रकार से सतत मन्त्रों का परिमर्शन होने पर मन्त्रों का यथार्थ वीर्य अधिगत होता है। मन्त्रचैतन्य के आधार में मन्त्र भावित होने पर भिन्न-भिन्न फलों का प्रसव करता है। तीन कोणों के अन्तराल में जो नित्य उन्मुख ( सदा विकसित ) ( मण्डलच्छद ) मण्डल को आच्छादित करनेवाला त्रिदल कमल है उससे नित्य संबद्ध ( उससे बराबर सम्बन्ध रखनेवाला ) जो षोडश दल कमल है उसका मूल उस कमल तक व्याप्त है। ये दोनों कमलों का मध्यभाग नाल से सज्जित ( गुम्फित ) है। मध्यभाग में स्थित इस मध्यनाल रूपी नाल से शोभित दोनों कमलों के क्रमिक घट्टन ( संघर्ष ) से उनके मध्य में स्थित परिपूर्ण चन्द्रमा के समान सौन्दर्यशाली, ( यह आनन्दमय है इसलिए सुन्दर है ) और रवि के किरण के समान उज्ज्वल इन दोनों कलाओं ( चन्द्र और सूर्य की कलायें ) के संघर्ष से चित्कला का प्रसर रूपी अंकुर की सृष्टि होती है जो त्रिदल कमल की कला अरुण ( रक्त ) वर्ण रजोलूप और रेतसरूप ( वीर्यरूप ) है। अतः चन्द्र, सूर्य और अग्नि आत्मक संघट्टरूप मुद्रा ( जिसे षडर मुद्रा कहते हैं ) के द्वारा सृष्टि आदि क्रम को ( सृष्टि, स्थिति और संहार ) हृदय में धारण करने पर तुरीयस्थिति ( अनाख्या ) प्राप्त होता है। इस खचरमुद्रा शक्ति और शक्तिमान् के परस्पर आवेश में आ जाने