तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ पर अर्थात् दोनों में सामरस्य भाव की स्थिति उत्पन्न होने पर उनके द्वारा उपयोग होनेवाले जो-जो वस्तुएँ हैं जैसे पानीय, उपभोग, लीला, हास्य आदि कार्य भी जिससे जो विमर्शमय स्थिति की उत्पत्ति होती है वह वास्तव में अव्यक्त ध्वनि, राव, स्फोट, श्रुति, नाद और नादान्त आदि स्वरूपों को धारण करते हुए अविच्छिन्न अनाहत परमार्थ स्वरूप होकर मंत्र का वीर्यात्मक बनता है । प्राण और अपान के गमन और आगमनों के विश्राम-भूमियों में, ( बुद्धि के भी ), और कानों से शब्द सुनते समय, नयनों से दृश्यों के दर्शन के अवसर पर, दोनों को यौन अंग के स्पर्श मात्र से, संघट्ट के समय, शरीर के उभय द्वादशान्तों में और यामल चक्र में स्थित होकर जप करना चाहिए । शक्ति का कुचमध्य जो हृदयस्थान है वहाँ से चलनेवाली ओष्ठ के अन्त तक कण्ठस्थल में स्थित जो अव्यक्त ध्वनि उठती है वह पूर्वोक्त चक्रद्वय के मध्यम तक जानेवाली है उसे संघट्ट के उपरम के समय सुनना है । उसी चक्र में सभी विश्रान्ति प्राप्त करते हैं । अव्यक्त आदि रूपों को धारण करते हुए परमोत्कृष्ट अष्टविध नादभैरव वहाँ उल्लसित होते हैं । ज्योति, अर्धचन्द्र, नाद, शक्ति आदि भी का उदय वहाँ से है— इसी प्रकार से परमा मान्त्री व्याप्ति का स्वरूप बतलाया जाता है । इस प्रकार सब कर्मों में व्याप्ति का स्मरण विद्वानों के द्वारा होने पर जीवित दशा में मुक्ति मिलती है । इसके ज्ञाता भी शास्त्र में मुक्त है और मेलक के अवसर पर जो जीव गर्भ में स्थित रहता है वह परम कौलिक विज्ञान का ज्ञाता बन जाता है । शून्य और अशून्य का लय स्थान जो एक दण्ड रूप मध्यममार्ग है, उसमें अनल और अनिल ( प्राण और अपान ) का लय त्रिशूल में समरसित इस प्रकारसे करना है जैसे रस में रस स्थित रहता है । शंकाविहीन होकर, किसी आचार से बद्ध न रहकर 'मैं न हूँ, इस प्रकार भावना के साथ देह स्थित देवताओं को दर्शन करते हुए ह्लाद और उद्वेग आदि को चिद्घन स्वरूप में अर्पित करना चाहिए ।