तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 290, कुल 294 में से
संदर्भ में पढ़ेंआ. २२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २०९ उस प्रकार व्याप्तिविशिष्ट विश्वमय प्राण में पूर्वोक्त संवित्-व्याप्ति के द्वारा तर्पण, अन्न, गन्ध, धूप आदि वस्तुओं के समर्पण से उसकी दृढ़ता सम्पादन करना ही प्राणयाग है। उस विषय में सुदृढ़ निष्ठा होने पर वही संवित्-याग का रूप धारण करता है—इसकी चर्चा पहले ही की गयी है। अतः इन यागों में किसी एक के सम्पादन के बाद यदि कोई शिष्य सन्देह- रहित होकर शुद्ध हृदय बन जाय तो उसे उस याग का दर्शन करा कर तिल, घृत तथा हवन आदि की अपेक्षा के बिना ही पूर्वोक्त व्याप्ति के अनुसन्धान से केवल दृष्टि के द्वारा उसे दीक्षा देनी चाहिए। परोक्ष दीक्षा प्रभृति में जिसका पर्यवसान नैमित्तिक कृत्य तक है, उस विषय में पूर्वोक्त विधि अवलम्बनीय है, लेकिन इस याग की मुख्यता के कारण यह केवल इतना ही है। गुरु के शरीर में जो सप्तम कुलयाग सम्पन्न होता है वह सबसे उत्तम है, वह भी पूर्वोक्त याग के साथ एकबार सम्पन्न होने पर सब की पूर्णता आती है। इति शिवम् इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य के द्वारा रचित तन्त्रसार के कुलयाग- प्रकाशन १ नाम का बाईसवाँ आह्निक है। १. इस आह्निक में कुलयागविधि का संक्षिप्त विवरण उपस्थित किया गया हैं। कौलिक क्रम के विषय में शिक्षित जनों में स्वाभाविक अनीहा है, क्योंकि इस क्रम में ऐसे कुछ आचारों का अनुष्ठान अवश्य करणीय हैं जो सुरुचिसम्पन्न मनुष्यों के विचार में सुष्ठु प्रतीत नहीं होता है। लेकिन इस प्रसंग में यह स्मरणीय हैं यह क्रम सर्वसाधारण के लिए नहीं अपितु जिन्होंने साधनसम्पत्ति की पराकाष्ठा प्राप्त की है और विकल्पहीन स्थिति अपनायी हैं उन 'धाराधिरूढ़' मनुष्यों के लिए ही यह मार्ग है, अन्य के लिए नहीं। अन्य प्रक्रिया से कुलप्रक्रिया विलक्षण भी है, क्योंकि यह सिद्धों की परंपरा से प्राप्त क्रम है, अतः इस क्रम में चलने वाले स्वल्प समय में जो कुछ प्राप्त करते हैं इससे भिन्न अन्य क्रम से चलने वाले नाना प्रकार मन्त्र समूहों के अनुष्ठान के द्वारा सहस्र वर्षों में उसे प्राप्त नहीं कर सकते। सिद्धान्त आदि तंत्रों में जिन मंत्रों का उल्लेख है, वे सब वीर्यहीन हैं क्योंकि वे शक्तितैज से वर्जित हैं, परन्तु सभी कौलिक मंत्र स्वभाव से ही दीप्त तेजोमय हैं और सद्य ही प्रत्यय उत्पन्न करने वाले हैं।