तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २२ इस प्रकार त्रिकक्रम-सम्प्रदाय जो सप्रत्यय तथा अप्रत्यय रूप से भिन्न है अशेष करुणाशील तथा स्वयं प्रसन्न श्री शम्भुनाथ से पाकर काश्मीर मण्डल के निवासी अभिनवगुप्त नामक ग्रन्थकार ने किसी वृत्ति के बिना श्री तंत्रसार ग्रन्थ की रचना सरल क्रम से किया है ताकि सभी मनुष्य शिवस्वरूप जो लोकोत्तर शाम्भवतंत्र का सारभूत है प्राप्त करें । इस ग्रन्थ के रचयिता श्रीमन्महामाहेश्वराचार्य श्रेष्ठ श्रीमदभिनवगुप्त पाद हैं। ❀ समाप्त ❀ कुल शब्द के कई अर्थ हैं जो निम्न प्रकार हैं—परमेश्वर ही कुल है, वह लय तथा उदय करने वाला सामर्थ्य है, सबका कारण होने से उसे ऊर्ध्वता भी कहते हैं : वह स्वातंत्र्यरूप है, ओजस, वीर्य, समग्र विश्व का सामरस्य रूपी पिण्ड भी वही है। वह संविद्रूपी चैतन्य है। वीरों के शरीर भी कुल है। कुल शब्द के इन अर्थों के जानने से ही नहीं किन्तु समग्र भाव समूहों को उस दृष्टि से देखना तथा अपनी उपलब्धि में लाकर जब सब प्रकार के संशय हृदय से बराबर के लिये समाप्त हो जाते हैं तथा समग्र विश्व योगी के समीप शिवशक्ति का ही प्रकट रूप है ऐसा प्रतीत होने लगता है तब योगी या वीरों के द्वारा किये हुए सभी आचार कुलयाग है । कुल याग छः प्रकार है—एक बिल्कुल बाह्य है जो स्थण्डिल आदि बाह्य वस्तुओं में किया जाता है। शक्ति, यामल, निज शरीर, प्राण तथा संवित् भी कुलयाग का आधार हैं इनमें संवित् ही सर्वोत्कृष्ट है। मध्य- नाड़ी जो प्राणवाही मार्ग है, उसमें भी कुलयाग सम्पन्न किया जाता है। कुल याग में स्नान, मण्डल, कुण्ड, छः प्रकार न्यास आदि उपयोगी समझे नहीं जाते हैं, इनका सम्पादन निषिद्ध भी नहीं है। जो वास्तविक कौल है वह सभी प्रकार आवरण से मुक्त है। वेद्य तथा वेदकरूपी जो विश्व हैं वे सभी कुल के ही विस्फार रूप हैं, अतः शुद्धि तथा अशुद्धि का विचार वह निरर्थक समझता है, अतः लोकनिन्दित तथा शास्त्रनिन्दित वस्तुओं से कुलयाग सम्पन्न करने में उसे कोई शंका का अनुभव नहीं होता है। आलोच्य आह्निक के अन्त में कतिपय श्लोक उपनिबद्ध हैं जिनमें कुलयाग का स्वरूप संक्षिप्तरूप से वर्णित है।