भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

आ. २१ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९५ अर्थात् उत्कृष्ट संस्कार है, और इस प्रकार संस्कार के अभाव होने पर जैसे उस विषय में उस व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं रहता है, अतः यह तुल्य ही है, क्योंकि आश्रम की भिन्नता के कारण अधिकार- भेद जैसे अवश्य स्वीकार्य होता है । फल के उत्कर्ष के कारण शास्त्र का उत्कर्ष माना जाता है। इस विषय में भी ( वेदों से ) भागवती उपनिषत् उत्कृष्ट है। भिन्न-भिन्न कर्ताओं से रचित होने पर भी सभी शास्त्र की रचना अन्ततोगत्या सर्वज्ञ के द्वारा ही हुई ऐसा मानना पड़ता है क्यों कि उनके द्वारा कही गयी विषयों के उनसे अतिरिक्त विषयों का योग उन्हीं से है। आगमों की नित्यता मानने पर भी प्रसिद्धि अवश्य स्वीकार्य है। अन्वय व्यतिरेक ( अनुमान ) और प्रत्यक्ष आदि और उनका प्रामाण्य प्रसिद्धि ( आगम ) मूलक है ! 'सत्य रजत देखता हूँ' इस प्रकार सौवर्णिकादि दूसरे के प्रामाण्यवश सिद्ध होता है। प्रसिद्धि ही आगम है। वह प्रसिद्धि कभी दृष्टफलक है जैसे भूखा आदमी भोजन करता है, अतः हम देखते हैं कि प्रसिद्धि के अनुसार भोजन आदि कार्यों में बालकों की प्रवृत्ति होती है, अन्वय व्यतिरेक से ( अनुमान से ) नहीं। शैशव में अन्वय व्यतिरेक का अभाव रहता है। युवावस्था में अन्वय व्यतिरेक की संभावना हो तो उस समय उससे कोई विशेष फल की प्राप्ति नहीं होती । प्रसिद्धिरूप मूल कारण को स्वीकार करते हुए अन्वय- व्यतिरेक हो तो ठीक है और उससे कोई कार्य की सिद्धि हो तो कोई आपत्ति नहीं उठती है। प्रसिद्धि जैसे दृष्टफल देनेवाली है वैसी वह अदृष्टफल देनेवाली भी है जैसे विदेह-कैवल्य, प्रकृतिलय, पुरुष कैवल्य आदि । कुछ प्रसिद्धि और शिवसाम्य स्वरूप देनेवाली, कुछ शिवैक्य देनेवाली है। दृष्टफल देनेवाली अदृष्ट फल देनेवाली प्रसिद्धियाँ भी अनेक प्रकार हैं—इस प्रकार नानाविध प्रसिद्धिपूर्ण जगत में जो जिस प्रकार स्थिति प्राप्त करनेवाला है वह उसी प्रकार प्रसिद्धि आकस्मिक रूप से अपने हृदय के अनुकूल मानकर ग्रहण करता है। अतः जो रिक्त है उसे अतिरिक्त वचन की क्या आवश्यकता है। उनमें से किसी एक प्रसिद्धि को प्रमाण के रूप में ग्रहण करनेवाले के द्वारा अवश्य स्वीकार करने योग्य आगमरूपी प्रामाण्य है । अतः उसी आगम का शरण लेना उचित है जहाँ फल उत्तम है। अब अन्य विषय की आलोचना से क्या लाभ है ?