तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंश आह्निक समस्त नित्य और नैमित्तिक कर्मों का वर्णन इस प्रकार से किया गया है। अब आगम के प्रामाण्य के विषय में कहा जा रहा है। संवित् ही जिसका एकमात्र स्वभाव है ऐसी जो विश्वात्मक संवित् है वह वास्तव में विमर्शस्वभाव है और विमर्श भी शब्दात्मक (वाग्रूपी) सिद्ध होने के कारण, समग्र विश्वमें सभी वस्तुओं के और उनसे सम्बन्धित कर्मफल की विचित्रता के सम्बन्ध में जो शब्दात्मक विमर्श (विचार) है वही शास्त्र है। अतएव परमेश्वर के स्वभाव से अभिन्न समग्र शास्त्रसमूह वास्तविकतया एक ही फल का प्रापक है, परन्तु एक से अधिक कार्यों के उद्देश्य से भिन्न-भिन्न शास्त्रों के प्रति लोगों की दृढ़निष्ठा परमेश्वर की नियतिशक्ति के महिमा के कारण उत्पन्न होती है। कुछ लोग मायाशक्ति के द्वारा उत्पन्न भेद-विमर्शात्मक वेदागम- रूप शास्त्र में दृढ़निष्ठा प्राप्त करते हैं, दूसरे लोग भी उसी प्रकार मोक्षा- भिमान से सांख्य और वैष्णवादि शास्त्रों के प्रति निष्ठाशील हैं, फिर दूसरे लोग विविक्त (विश्वोत्तीर्ण) शिव-स्वभाव के आमर्शन ही जिसका सार है ऐसे शैवसिद्धान्त आदि शास्त्रों में, फिर दूसरे सर्वमय परमेश्वर के आमर्शनात्मक मतंगादिशास्त्रों में, कुछ लोग जो बहुत ही विरल हैं सब प्रकार अवच्छिन्नता से रहित स्वातंत्र्यानन्द रूप परमार्थसंविन्मय परमेश्वर के आमर्शात्मक त्रिकशास्त्र के क्रम में, कुछ लोग पूर्व-पूर्व शास्त्रों को त्यागते हुए या उनके उल्लंघन से परमार्थ के मार्ग में प्रविष्ट होते हैं, अतः इससे सिद्ध होता है कि एक प्रकार फल की सिद्धि एक ही आगम से होती है। भेदवाद में भी (अर्थात् न्यायवैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार भी) सभी आगमों का प्रामाण्य एक मात्र ईश्वर से रचित होने के कारण ही सिद्ध होता है। प्रामाण्य के कारण ही एक जगह सत्यतासम्बन्धी अविरोध उत्पन्न होता है और कार्य में प्रवृत्ति आती है और यह इस प्रकार नहीं है, ऐसा जानकर किसी विषय में प्रवृत्ति नहीं होती है, अतः दोनों समान हैं, अतः एक दूसरे से जो विरोध है वह विषय की भिन्नता के कारण होता है इसलिए यह अकिञ्चित्कर है। ब्रह्महत्या और उसका निषेध जैसे संस्कार भेद और संस्कार का अतिशय