भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

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१९६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २१ संवित् प्रकाशरूपी परमार्थ जिस प्रकार प्रकाशमान् रहकर विमर्शन- शील है सज्जनगण उसे उसी प्रकार हृदय से विचार करते हैं, अतः सभी में स्थित चित्प्रतिभाविमर्श के साररूपी अनुत्तरात्मक शास्त्र का आश्रयण कीजिये। अपने सुदृढ़ विश्वास से निर्मित व्यवहार में मनुष्य शंका ( संशय ) रहित रहता है। परमशिवरूपी प्रसिद्धि में दृढ़निष्ठा उत्पन्न होने पर मनुष्य परमशिव बनता है। इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य के द्वारा रचित तन्त्रसार के आगम प्रामाण्य प्रकाशन नाम का इक्कीसवाँ आह्निक है।