तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १ ज्ञान है, यही संसार का मूलकारण है—मल के निरूपण करते समय हम इस की आलोचना करेंगे । ( इन दोनों अज्ञानों में ) पौरुष अज्ञान दीक्षा आदि से निवृत्त होने पर भी, दीक्षा भी बुद्धिनिष्ठ अनध्यवसायात्मक अज्ञान के रहते हुए सम्भव नहीं होती—क्यों कि देह तथा उपादेय के निश्चय पहले होने पर ही तत्त्वों के शोधन के अनन्तर शिवयोजनरूप दीक्षा सम्भव होती । उसमें अध्यवसायत्मक बुद्धिनिष्ठ ज्ञान ही मुख्य माना जाता है जिसके पुनः पुनः अभ्यास से पौरुष अज्ञान का नाश होता है । विकल्पज्ञान के पुनः पुनः अभ्यास से अन्त में अविकल्पात्मक ज्ञान का उदय होता है । विकल्प के द्वारा असंकुचित संवित्-प्रकाशमय आत्मा ही शिवस्वभाव है इसलिए सब प्रकार से समस्त वस्तुनिष्ठ सम्यक् निश्चयात्मक ज्ञान ही उपादेय है । वह (ज्ञान) शास्त्रज्ञान पर आधारित है। परमेश्वर के द्वारा भाषित ज्ञान ही प्रमाण है ।¹ अपरशास्त्रों में आलोचित तत्त्वसमूह एक दूसरों से पृथक् रूप में स्वीकृत हुआ है और उन तत्त्वों से अतिरिक्त पूर्णप्रथा का निरूपण प्रमाणरूपी युक्ति द्वारा हुआ भी है, इसलिए अपर आगमों ( शास्त्रों ) से आलोचित ज्ञान² कुछ दूर तक ही बन्धन के निवृत्ति में सहायक है, सब से नहीं । सब से मुक्त करनेवाला परमेश्वर शास्त्र ही है जो पञ्चस्रोतमय³, दश, अष्टादश तथा चौषष्ठी प्रकार भेदों से भिन्न है । उन सब के सार त्रिक शास्त्र है और उनमें मुख्य मालिनीविजय तन्त्र है । उसमें निहित विषयों के संकलन १. अपर शास्त्रों से बौद्ध वैष्णवादि शास्त्रों को समझना चाहिए । २. अन्य आगमों के मनन से उन-उन तत्त्वों से मुक्ति मिलती है—जैसे सांख्य तथा पतञ्जलि सम्मत सिद्धान्त के अनुशीलन से प्रकृति कैवल्य हो सकता है लेकिन प्रकृति से ऊपर माया से छुटकारा नहीं मिलता । ३. पंचस्रोतोमय कहने का तात्पर्य यह है कि शास्त्रों का अवतरण परमेश्वर के चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया रूपी जो पाँच मुख हैं जो वस्तुतः उनकी पाँच शक्तियां है जो शिव के ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव तथा अघोर रूपी पाँच मुखों से सम्बन्धित हैं। पहले पाँच आगमों का अवतरण होता है । इन आगमों में कुछ भेदप्रधान, कुछ भेदाभेदप्रधान और कुछ अभेद प्रधान है । भेद प्रधान आगमों की संख्या दस हैं, भेदाभेद प्रधान आगमों की संख्या अठारह और अभेद प्रधान आगमों की संख्या ६४ हैं ।