भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

आ. १ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३ विस्तृत ( विशाल ) तन्त्रालोक में अवगाहन करने का सामर्थ्य सब का नहीं है। इसलिए सरल वाक्यों से विरचित इस तन्त्रसार (ग्रन्थ) का श्रवण करें ॥२॥ श्रीशम्भुनाथरूपी भास्कर के चरणों पर प्रणामरूपी प्रकाश से अभिनवगुप्त के हृदयकमल खिल उठा है। महेश्वर के पूजन के लिए उसे (सज्जन लोग) संग्रह करें ॥३॥ इस संसार में ज्ञान ही मोक्ष का कारण है क्यों कि वह बन्ध के कारण अज्ञान¹ का विरोधी है। अज्ञान बौद्ध और पौरुष भेद से दो प्रकार हैं, उनमें बौद्ध अज्ञान अनिश्चित स्वभाव तथा विपरीत निश्चयात्मक है। पौरुष अज्ञान स्वभावतः विकल्परूपी है और संकुचित १. अद्वैत तन्त्र मत के अनुसार अज्ञान पौरुष तथा बौद्ध दो प्रकार हैं, ज्ञान भी पौरुष तथा बौद्ध दो प्रकार हैं। पौरुष ज्ञान विकल्पहीन है और पूर्ण अहन्ता बोधमय है। परमेश्वर के साथ पूर्ण तादात्म्य लाभ होने पर ही इसकी अभिव्यक्ति होती है। लेकिन पौरुष अज्ञान विकल्प-स्वभाव है। यह पूर्ण प्रथा के विपरीत संकुचित प्रथा है, यह अपूर्ण ज्ञान है तथा संसार का मूल कारण है। दीक्षा के द्वारा पौरुष अज्ञान के नाश हो जाने पर भी देह के आरम्भक कार्ममल की सत्ता बनी ही रहती है, अतः पौरुष ज्ञान का उदय नहीं होता। कार्ममल प्रारब्ध रूप है। जब प्रारब्ध का पूर्णतया क्षय हो जाता है, तब शरीर छूट जाता है। उसके अनन्तर पौरुष ज्ञान का उदय होता है। इस विषय में क्रम इस प्रकार है। दीक्षा, पौरुष अज्ञान का नाश, अद्वय आगम शास्त्र के श्रवण का अधिकार, बौद्ध ज्ञान का उदय, बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति, जीवन्मुक्ति, भोग के द्वारा प्रारब्ध का नाश, देहपात के अनन्तर पौरुष ज्ञान का उदय, स्वरूप प्राप्ति। बौद्ध अज्ञान दो प्रकार है---- (१) तात्त्विक स्वरूप के अनिश्चयात्मक अज्ञान। (२) अनात्म वस्तुओं में आत्मबोध रूप विपरीत निश्चयात्मक अज्ञान। परमेश्वर द्वारा भाषित शास्त्रों का श्रवण तथा मनन से बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति होती है और वस्तुओं का तात्त्विक स्वरूप हृदय में प्रतिफलित होता है।