भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १ तावत एव बन्धात् विमोचकम्, न सर्वस्मात्, सर्वस्मात् तु विमोचकं परमेश्वरशास्त्रं, पञ्चस्रोतो [मयं] दशाष्टादशवस्वष्टभेदभिन्नम् । ततोऽपि सर्वस्मात् सारं षडर्धशास्त्राणि । तेभ्योऽपि मालिनीविजयम् । तदन्तर्गत- श्चार्थः संकलय्याशक्यौ निरूपयितुम् । न च अनिरूपितवस्तुतत्त्वस्य मुक्तत्वं मोचकत्वं वा, शुद्धस्य ज्ञानस्यैव तथारूपत्वात् इति । स्वभ्यस्तज्ञान मूलत्वात् परपुरुषार्थस्य तत्सिद्धये इदम् आरभ्यते— मेरा हृदय¹ उन दोनों के सामरस्य² से स्फुरित अनुत्तर अमृतमय कला रूप में जो उभय के यामल से प्रकाशमान होकर विसर्गमय है, विकसित हो उठे। ये उभय जननी³ और जनक हैं। वह जननी जो विमलकलाका आश्रय होकर आदि सृष्टि रूप तेज धारण करती हुई वर्तमान हैं और वह जनक⁴ जो सर्वतोभाव से परिपूर्ण हो पंचशक्ति से सम्बद्ध रहकर पंचकृत्यों से अभिलाषी हैं ॥१॥ १. यहाँ हृदय शब्द से जगदानन्द रूप आनन्द को ग्रहण करना चाहिए, जो ग्रन्थकार का आशय है। आनन्दका परम उत्कर्ष जगदानन्द है जो छः प्रकार आनन्दों के एक अनुसन्धाता हैं। यह नित्योदित अर्थात् इस आनन्द का न तो उदय है न अस्त । अन्तर्विश्रान्ति ही इसका वास्तविक स्वरूप है । २. यामल तत्त्व शिव और शक्ति का परम सामरस्य रूप है । इसे संघट्ट भी कहा जाता है । सृष्टि प्रक्रिया में यामलभाव से तत्त्व आदि की रचना होती है । सृष्टि के मूल में जो परम अद्वय तत्त्व है जिसे परमसाम्य कहा जाता है उस भाव में जब ईषत् वैषम्य का उदय होता है तो वही एक ही दो बनकर तीन या बहु बनता है । शिव और शक्ति के सामरस्य से दोनों की छटा धारण करनेवाला विसर्ग जो स्वभाव से ही बाहर की ओर प्रसृत होता है, उदित होता है। शास्त्रों में इसका वर्णन हार्धकला के रूप में हुआ है। कुल शरीर का पर्यायवाची शब्द है लेकिन यहाँ यह कुल शरीर होते हुए भी स्वरूपतः अनुत्तर तथा अमृतमय है। यह काल के कलंक से मलिन नहीं होता, अमाकला उसका स्वरूप है। ३. जननी स्वातन्त्र्य शक्ति रूपिणी हैं, वह सब प्रकार परिच्छिन्नता से परे है, पर विमर्श ही उसका एकमात्र स्वरूप है । ४. जनक शिवजी हैं जो पंचमुख हैं, चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया ही उनके पाँच मुख हैं—ये मुख ही उनकी पाँच शक्तियाँ हैं और वे निरन्तर सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान तथा अनुग्रह रूप कृत्य कर रहे हैं।