तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १ स्थित शिवरूप हैं। वह अपने स्वातन्त्र्य के बल से अपने को संकुचित रूप में आभासित करते हैं इसलिए वह अणु कहलाते हैं। फिर वे अपनी आत्मा को स्वतन्त्रतावश प्रकाशित करते हैं ताकि अनवच्छिन्न प्रकाश रूप शिवत्व प्रकाशित हो उठे। वह अपनी स्वतन्त्रता को बिना किसी उपाय के (अनुपाय) निज आत्मा को प्रकाशित करते हैं या किसी उपाय के द्वारा ? उपाय होते हुए इच्छा या ज्ञान या क्रिया कोई भी उपाय बन सकता है, इसलिए समावेश शाम्भव, शाक्त, आणव आदि के भेद से तीन प्रकार हैं—इन चार प्रकार के उपायों का स्वरूप क्रमशः यहाँ उपदेश किया जा रहा है। प्रकाश-विग्रह आत्मस्वरूप शिव जो स्वतन्त्र स्वभाव हैं स्वातन्त्र्य लीलारस के आस्वादन के लिए अपने स्वरूप को ढक कर, फिर अपना पूर्ण स्वरूप को प्रकाशित करते हैं—यह प्रकाशन क्रम तथा अक्रम में या तीन उपायों के द्वारा होता है ॥५॥ यह प्रकाशरूपी आत्मा जो स्वच्छन्द हैं निज स्वरूप ढक देते हैं फिर अकस्मात् उस परमार्थ शिवरूप अमृत को अक्रम या क्रम के बिना प्रकाशित करते हैं। श्रीमदभिनवगुप्त विरचित विज्ञानभेद प्रदर्शन नामक प्रथम आह्निक समाप्त।