तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. १ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ७ कर एक स्थान में उपस्थित कर देना कठिन है । वस्तुतत्त्व का सही निरूपण हुए बिना उसे मुक्तता या मोचक कहा नहीं जा सकता । विशुद्ध ज्ञान का ही यही वास्तविक स्वरूप है । निज स्वरूप में ज्ञान के अभ्यास से ज्ञानमूलक परमपुरुषार्थ लाभ होता है । अतः उसकी सिद्धि के लिए शास्त्र का आरम्भ हो रहा है । शास्त्रों में अज्ञान जो बन्धन के कारण के रूप में वर्णित हुआ है मल रूप १ है । पूर्ण ज्ञानरूपी कला के उदय से वह निखिल मल निर्मूल हो जाता है । मलों का पूर्णतया नाश होने पर आत्मसंविद् के उदय से मोक्ष अधिगत होता है । मैं इस शास्त्र के द्वारा निखिल ज्ञेय तत्त्वों का प्रकट करूँगा ॥४॥ उपोद्घात इस शास्त्र में स्वभाव ही परम उपादेय वस्तु है । वह स्वभाव सब अस्तित्वशील विषयों का प्रकाशरूपी है, जो अप्रकाश है उसे स्वभाव कहना अनुपपन्न है । यह प्रकाश अनेक नहीं (अपितु एक है) । प्रकाश से भिन्न कोई स्वभाव में अनुप्रवेश के अभाव से अर्थात् स्वभाव में कोई भेद न होने के कारण (स्वभाव एक है ) । देश और काल भी उसका भेदक नहीं क्यों कि वे दोनों उस प्रकाशक के ही स्वभाव हैं । अतः वह एक ही है—वह है संवित् । विषयों का प्रकाशक वस्तुतः संवित् है—इस विषय में सभी की सम्मति है । वह प्रकाश अन्य के अधीन नहीं है, प्रकाश्यता ही परतन्त्रता है, क्यों कि प्रकाश्यता दूसरे प्रकाश के मुखापेक्षी है । अन्य कोई प्रकाश नहीं है, इसलिए स्वतन्त्र एक ही प्रकाश विराजमान है। स्वतन्त्र होने के कारण देश, काल तथा आकार आदि से उसमें परिच्छिन्नता नहीं आ सकती, अतः उसमें उसका अभाव है, इसलिए वह व्यापक, नित्य साकार तथा निराकार आदि स्वभाव है । उसकी स्व- तन्त्रता आनन्दशक्ति, आनन्द का चमत्कार इच्छाशक्ति, प्रकाशरूपता चिच्छक्ति, आमर्शकता ज्ञानशक्ति, सब आकारों से युक्त होना क्रियाशक्ति- इस प्रकार मुख्य शक्तियों से युक्त रहते हुए भी वस्तुतः इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया शक्ति से युक्त अपरिच्छिन्न प्रकाश अपने आनन्द स्वरूप में १. मल आणव, मायीय और कार्म आदि के भेद से तीन प्रकार है । ये तीनों अज्ञान रूपी हैं ।